
Supreme Court agrees to hear plea against provisions of Places of Worship Act 1991 on September 9
'प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991' को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 9 सितंबर को सुनवाई करेगा। दरअसल, वकील अश्वनी उपाध्याय और कुछ अन्य लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करके प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 को चुनौती दी है। इस मामले में केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने 12 मार्च 2021 को नोटिस जारी किया था, मगर उसके बाद 6 बार मामला लिस्ट हुआ लेकिन डिले होता रहा। ऐसे में वकील अश्वी उपाध्याय की ओर से गुहार लगाई गई है कि इस बार जो डेट लिस्ट की गई है उसे डिले न किया जाए और मामले की सुनवाई की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए सहमति जता दी है।
याचिका में कहा गया है कि उक्त प्रावधान संविधान के अनुच्छेद-14, 15, 21, 25, 26 व 29 का उल्लंघन करता है। संविधान के समानता का अधिकार, जीवन का अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 दखल देता है। केंद्र सरकार ने अपने जूरिडिक्शन से बाहर जाकर ये कानून बनाया है। याचिका में यह भी कहा गया कि सरकार को किसी समुदाय से लगाव या द्वेष नहीं रखना चाहिए। लेकिन उसने हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख को अपना हक मांगने से रोकने कानून बनाया है। याचिकाकर्ता ने पूजा स्थल अधिनियम 1991 की धारा 2, 3, और 4 की संवैधानिक वैद्यता को चुनौती दी है।
प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 में लागू किया गया था। उस वक्त राम मंदिर आंदोलन अपने चरम सीमा पर थी। इस आंदोलन का प्रभाव देश के अन्य मंदिरों और मस्जिदों पर भी पड़ा। उस वक्त अयोध्या के अलावा भी कई विवाद सामने आने लगे। जिसके बाद इस पर विराम लगाने के लिए उस वक्त की नरसिम्हा राव सरकार ये कानून लेकर आई थी।
इस कानून के तहत 15 अगस्त 1947 से पहले मौजूद किसी भी धर्म के उपासना स्थल को किसी दूसरे धर्म के उपासना स्थल में नहीं बदला जा सकता है। इस कानून में कहा गया है कि अगर कोई ऐसा करता है तो उसे जेल भेजा जा सकता है. इस कानून के मुताबिक आजादी के समय जो धार्मिक स्थल जैसा था वैसा ही रहेगा।
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Published on:
05 Sept 2022 12:04 pm
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