
पैकेज्ड फूड पर सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी(AI Photo-ChatGpt)
FSSAI: सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड खाद्य पदार्थों में ज्यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की जानकारी देने वाले फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल को लागू करने में देरी पर केंद्र सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि अगर सरकार जरूरी कदम नहीं उठाती है तो वह खुद आदेश जारी करेगा। मामले में केंद्र को अनुपालन के लिए दो हफ्ते का समय दिया गया है और अगली सुनवाई में फैसला सुनाने की चेतावनी दी गई है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और एफएसएसएआई के रुख पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने पूछा कि पहले दिए गए उसके निर्देशों का अब तक पालन क्यों नहीं हुआ और सरकार ने इस दिशा में क्या कदम उठाए हैं। पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चाहर से कहा कि सरकार को कोर्ट के निर्देश के मुताबिक ही कार्रवाई करनी होगी। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि अगर आप नहीं कर सकते तो हम आदेश देंगे। पीठ ने यह भी पूछा कि क्या सरकार जरूरी कार्रवाई करने को तैयार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यह मामला सीधे नागरिकों, खासकर बढ़ते बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ा है और ऐसे फैसलों पर कॉरपोरेट दबाव का असर नहीं होना चाहिए।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और एफएसएसएआई से पूछा कि क्या वे बड़े कॉरपोरेट संस्थानों के दबाव में हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि सरकार पर बड़ी कॉरपोरेट इकाइयों का भारी दबाव है और वह उस दबाव के आगे झुक रही है। कोर्ट ने कहा कि वह यह कदम 'जनहित' में उठा रहा है। पीठ ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि जब चेतावनी लेबल के जरिए उपभोक्ताओं को खाद्य उत्पादों में मौजूद चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की मात्रा की जानकारी दी जा सकती है तो इसे लागू करने में परेशानी क्यों है।
याचिकाकर्ता के वकील ने 7 मार्च को हुई एफएसएसएआई की बैठक के मिनट्स का हवाला दिया। उनका कहना था कि बैठक में लिए गए फैसले सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों के सीधे विपरीत हैं। याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि एफएसएसएआई ने अपने हलफनामे में मुख्य रूप से खाद्य उद्योग के चेतावनी लेबल के विरोध का उल्लेख किया है। वहीं, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों की ओर से पेश किए गए उन सबूतों का पर्याप्त जिक्र नहीं किया गया, जिनमें ज्यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले खाद्य पदार्थों की खपत को हतोत्साहित करने के लिए चेतावनी लेबल की जरूरत बताई गई थी।
एफएसएसएआई ने खाद्य उद्योग के विरोध का हवाला देते हुए पैकेट पर एक तालिका के जरिए अतिरिक्त चीनी, सैचुरेटेड फैट और नमक की अनुशंसित दैनिक मात्रा बताने का सुझाव दिया है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि चेतावनी लेबल का उद्देश्य किसी उत्पाद की बिक्री रोकना नहीं है। इसका मकसद सिर्फ उपभोक्ता को यह बताना है कि वह क्या खा रहा है, ताकि खरीदारी का अंतिम फैसला उपभोक्ता खुद कर सके।
पीठ ने कहा कि निर्माता इस व्यवस्था को पसंद नहीं कर सकते क्योंकि इसका उनके कारोबार पर असर पड़ सकता है, लेकिन इस मामले में निर्णायक भूमिका उपभोक्ता की होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार को देश के लोगों और खासकर बच्चों के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए। पीठ ने कहा कि हो सकता है कि निर्माताओं को चेतावनी लेबल पसंद न आएं, लेकिन उपभोक्ता को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि वह क्या खा रहा है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चेतावनी लेबल का मतलब किसी उत्पाद की बिक्री पर रोक लगाना नहीं है। चेतावनी के बावजूद उत्पाद खरीदना है या नहीं, इसका अंतिम फैसला उपभोक्ता ही करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को लेबलिंग प्रस्ताव पर अनुपालन के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। पीठ ने चेतावनी दी कि अगली सुनवाई में इस मामले में फैसला सुनाया जाएगा।
Updated on:
13 Aug 2026 03:10 pm
Published on:
13 Aug 2026 03:10 pm
