
Lateral Entry: मोदी सरकार सरकारी कामकाज में पांच साल पहले एक नया तरीका लाई थी, जिसको लेटरल एंट्री कहा जाता है। इस तरह की भर्ती 2019 में पहली बार की गई थी, और अब इसे बड़े पैमाने पर दोहराया जा रहा है। लेटरल एंट्री को सरकारी नौकरशाही में बाहरी विशेषज्ञों को लाने की योजना के तौर पर समझा जा सकता है। मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही प्रशासनिक तंत्र में नई ऊर्जा लाने के लिए प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। केंद्र सरकार ने इस सप्ताह की शुरुआत में ही कैबिनेट सचिव और गृह सचिव सहित 20 सचिवों के तबादले किए हैं। इसके साथ ही, सरकार ने प्रशासनिक क्षमता को बढ़ाने के लिए एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। वह है 'डोमेन एक्सपर्ट्स' यानी विशेषज्ञों की भर्ती। केंद्रीय लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने इस संबंध में एक विज्ञापन जारी किया है।
लैटरल एंट्री को लेकर मचे सियासी बवाल के बीच एक बार फिर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार अपने इस कदम से दलितों के हितों पर कुठाराघात करना चाहती है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपने सोशल मीडिया एक्स हैंडल पर इस संबंध में पोस्ट किया। इसमें उन्होंने कहा, "लैटरल एंट्री दलित, ओबीसी और आदिवासियों पर हमला है। भाजपा का राम राज्य का विकृत संस्करण संविधान को नष्ट करना और बहुजनों से आरक्षण छीनना चाहता है। यूं तो कांग्रेस नेता शुरू से ही दलितों, ओबीसी और आदिवासियों के मुद्दे को लेकर मोदी सरकार पर हमलावर रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ दिनों से ‘लैटरल एंट्री’ को लेकर हंगामा बरप रहा है, जिसे लेकर राहुल गांधी ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है। इस पर कई विपक्षी दलों ने मोदी सरकार पर निशाना साधा है। विपक्षी दल इसे संविधान पर कुठाराघात करार दे रहे हैं।"
लेटरल एंट्री के माध्यम से प्रशासनिक सेवाओं में अधिकारियों की सीधी भर्ती को लेकर विपक्ष की आलोचनाओं के बीच रेलवे तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने रविवार को कहा कि इस मामले में कांग्रेस का विरोध पाखंड के अलावा कुछ नहीं है क्योंकि इसकी अवधारणा यूपीए सरकार के समय ही तैयार हुई थी। केंद्रीय मंत्री ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, "लेटरल एंट्री मामले में कांग्रेस का पाखंड स्पष्ट है। लेटरल एंट्री की अवधारणा को यूपीए सरकार ने ही तैयार की थी।"
उन्होंने लिखा कि दूसरा प्रशासनिक सुधार आयोग (एआरसी) 2005 में यूपीए सरकार के दौरान गठित किया गया था जिसके अध्यक्ष वीरप्पा मोइली थे। आयोग ने विशेष ज्ञान की आवश्यकता वाले पदों में रिक्तियों को भरने के लिए विशेषज्ञों की भर्ती की सिफारिश की थी। वैष्णव ने कहा, "एनडीए सरकार ने इस सिफारिश को लागू करने के लिए एक पारदर्शी तरीका बनाया है। यूपीएससी के माध्यम से पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से भर्ती की जाएगी। इस सुधार से शासन में सुधार होगा।"
मुख्तलिफ मंत्रालयों में सचिव, उपसचिव सहित अन्य पदों पर अधिकारियों की भर्ती यूपीएससी एग्जाम से होती है। इसे देश की सर्वाधिक कठिन परीक्षा माना जाता है। जिसमें सफल होना निसंदेह किसी भी परीक्षार्थी के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। इस परीक्षा का आयोजन प्रतिवर्ष होता है। इसमें लाखों विद्यार्थी कई वर्षों के कठिन परिश्रम के बाद हिस्सा लेने की हिम्मत जुटा पाते हैं, लेकिन इसके बावजूद भी इस बात की गारंटी नहीं होती कि वो इस परीक्षा में सफल हो पाएंगे या नहीं। यह परीक्षा मूल रूप से तीन चरणों में होती है। पहला प्रीलिम्स, दूसरा मेन्स और तीसरा साक्षात्कार। इन चरणों के गुजरने के बाद परीक्षार्थियों को किसी भी मंत्रालय में विधिवत रूप से अपने कार्यों का निर्वहन करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके बाद वे इस पद का निर्वहन करने में सक्षम हो पाते हैं। वहीं, कई वर्षों तक किसी निश्चित मंत्रालय में कार्यरत रहने के बाद उन्हें सचिव या उपसचिव सरीखे पदों की जिम्मेदारी संभालने का मौका मिलता है, लेकिन अब केंद्र सरकार ने एक ऐसी व्यवस्था विकसित करने का फैसला किया है, जिसके अंतर्गत कोई भी व्यक्ति बिना यूपीएससी की परीक्षा दिए ही इन पदों की जिम्मेदारी संभालने में सक्षम हो पाएगा। केंद्र सरकार की इसी व्यवस्था को लेकर सियासी बवाल मचा हुआ है।
Published on:
19 Aug 2024 05:00 pm
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