
बालेन शाह ने दर्ज की जीत (फोटो-IANS)
नेपाल में राजनीति में नए युग की शुरुआत हुई है। महज तीन साल पहले बनी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को अभूतपूर्व बहुमत मिला है। पुरानी पार्टियां पूरी तरह से धराशायी हो गई हैं। नेपाल में कुल 275 सीटें हैं। 165 सीटों पर प्रतिनिधियों का सीधा चुनाव होता है। वहीं, 110 सीटों को समानुपातिक आधार पर बांटा जाता है। 165 में से RSP ने 120 से अधिक सीटें जीत ली हैं। सरकार बनाने के लिए 138 सीटों की जरूरत होगी, जबकि आरएसपी 180 से ज्यादा सीटें जीतने की ओर बढ़ रही है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव में जीत मिलने पर RSP प्रमुख रवि लामिछाने और पीएम उम्मीदवार बालेन शाह को जीत की बधाई दी।
दरअसल, 2025 के सितंबर महीने में हुए GenZ के विरोध प्रदर्शनों के बाद जब प्रधानमंत्री KP शर्मा ओली की सरकार गिर गई। सुशीला कार्की देश की अंतरिम प्रधानमंत्री बनी। उन्होंने लोगों से 6 महीने के भीतर चुनाव कराने और नई सरकार का वादा किया था। 5 मार्च को हुए चुनाव में RSP की जीत हुई। बालेन शाह अब देश के पीएम बनने जा रहे हैं। चुनाव प्रचार के दौरान अबकी बार मोदी सरकार जैसे नारों के तर्ज पर नेपाल में भी अबकी बार बालेन सरकार के नारे लगाए गए। RSP का चुनाव चिन्ह घंटी को घर घर पहुंचाया गया। इसका फायदा पार्टी और बालेन दोनों को मिला। बांग्लादेश के बाद नेपाल में हुए चुनाव पर भारत सरकार और लोगों की नजर थी।
बालेंद्र शाह ऊर्फ बालेन शाह महज 35 साल की उम्र में नेपाल के पीएम बनने जा रहे हैं। वह सबसे कम उम्र में पीएम बनने वाले प्रधानमंत्री होंगे। बालेन का परिवार का संबंध नेपाल के तराई वाले मधेस इलाके से है। हालांकि, चुनाव अभियान में उन्होंने इसके बारे में खुलकर बात नहीं की। बालेन ने भारत में स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है।
बालेन ने चुनाव जीतने के साथ ही कई सारी पुरानी अवधाराणों को भी तोड़ दिया है। वह नेपाल के पहले मधेसी मूल के पीएम होंगे। वहीं, साल 2008 में नेपाल में जब पूर्णत: राजशाही खत्म हुई और नया संविधान लागू हुआ। तब कहा गया था कि नए संविधान के तहत होने वाले चुनाव में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलेगा और देश को मिली जुली सरकार ही चलाएगी।
सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी ने एक्स पर लिखा कि भारत को अभी तक नेपाल की तीनों पुरानी पार्टियों नेपाली कांग्रेस, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) के साथ काम करने का अनुभव रहा है, लेकिन अब वहां की सत्ता में RSP काबिज होने जा रही है, लिहाजा भारत के लिए यह चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
उन्होंने आगे कहा कि नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों की करारी हार चीन की 'पड़ोसी रणनीति' के लिए एक बड़ा झटका है, तो भारत को इसका समझदारी से फायदा उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि नेपाल की राजनीति में आया यह बदलाव भारत को काठमांडू में अपना प्रभाव फिर से जमाने का मौका भी दे सकता है, बशर्ते नई दिल्ली समझदारी से काम ले।
चेलानी ने एक्स पर लिखा कि चीन ने काठमांडू में बीजिंग समर्थक एक स्थिर सरकार सुनिश्चित करने के लिए इन्हीं पार्टियों पर भरोसा किया था। बीजिंग ने नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ रिश्ते बनाने और उनके बीच एकता को बढ़ावा देने में सालों बिताए थे। असल में, बीजिंग के ही समर्थन से प्रचंड ने माओवादी विद्रोह का नेतृत्व किया था और 2006 में नेपाल में राजशाही को खत्म कर दिया था, जो आखिरी हिंदू साम्राज्य था।
नेपाल में भारत के राजदूत रहे रंजीत राय मानते हैं कि काठमांडू का मेयर होना दूसरी बात है और नेपाल का प्रधानमंत्री होना बिल्कुल अलग बात है। बालेन के पास अभी अधिक जिम्मेदारियां और शक्ति आएंगी। वहीं, बीबीसी से बात करते हुए डेनमार्क में नेपाल के राजदूत रहे विजयकांत कर्ण ने कहा कि बालेन शाह का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं हो सकता है कि उन्होंने अतीत में क्या कहा था। भारत को सोचना चाहिए कि नेपाल का जनादेश युवा सोच के साथ है। आप पुरानी सरकारों की तरह नई सरकार के साथ काम नहीं कर सकते।
नेपाल के साथ भारत का रोटी-बेटी का संबंध रहा है। भारत और नेपाल के संबंध इतने गहरे रहे हैं कि इसकी कल्पना कनाडा-अमेरिका या किसी दो यूरोपीय देशों के बीच भी नहीं जा सकती है। भौगोलिक रूप से लैंडलॉक्ड कंट्री होने के चलते नेपाली लोगों का भारत में कामकाज के सिलसिले में पहुंचा भी दशकों से जारी रहा है। हालांकि, 2015 के सीमा नाकाबंदी विवाद और उसके बाद 2019-2020 में क्षेत्रीय दावों को लेकर हुए कूटनीतिक टकराव के बाद भारत के नेपाल के साथ रिश्तों में खटास आई थी। जिसे अब नए सिरे से सुधारा जा सकता है।
Updated on:
10 Mar 2026 02:02 pm
Published on:
10 Mar 2026 01:54 pm
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