प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रानी वेलु नचियार को उनकी जयंती पर नमन किया है। इसके साथ ही कहा है कि उनकी प्रतिभा पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। आइए जानते हैं आखिर कौन हैं रानी वेलु नचियार जिन्हें PM ने उनकी जयंती पर याद किया है?
रानी वेलु नचियार 18वीं शताब्दी की योद्धा , जो वर्तमान के तमिलनाडु में शिवगंगई एस्टेट से ताल्लुक रखती थी, जो सेतुपति वंश के शाही जोड़े की इकलौती बेटी थी। वह मार्शल आर्ट, तीरंदाजी और घुड़सवारी में प्रशिक्षित थी। इसके साथ ही वह फ्रेंच सहित कई भाषाओं को जानती थी। रानी वेलु नचियार की जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'साहसी' भावना को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए नमन किया है। प्रधानमंत्री ने ट्वीट करते हुए कहा कि "वीरमंगई रानी वेलु नचियार को उनके जन्मदिन पर शत शत नमन। वह खड़ी हुई और अपने लोगों के लिए न्याय के लिए लड़ी। उन्होंने उपनिवेशवाद का सक्रिय रूप से विरोध किया और सामाजिक भलाई के लिए काम किया। उनकी प्रतिभा पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।"
प्रसिद्ध योद्धा रानी वेलु नचियार के जीवन से जुड़ी कुछ जरूरी बातें
- रानी वेलु नचियार शाही उत्तराधिकारी के रूप में पली-बढ़ी थी। उनके जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब अर्कोट के नवाब के बेटे के नेतृत्व में अंग्रेजों ने कलैयार कोइल युद्ध में उनके पति मुथु वदुगनाथ थेवर की हत्या कर दी। इस घटना के बाद रानी वेलु नचियार और उनकी बेटी को अपनी जमीन छोड़कर भागने के लिए मजबूर होना पड़ा।
- अपनी जमीन छोड़कर भागने के बाद योद्धा रानी वेलु नचियार डिंडीगुल पहुंची। जहां उन्होंने अपने शासक गोपाल नायकर के अधीन आठ साल बिताए। सरकारी अभिलेखागार में बताया गया है कि वह वहां पर मैसूर के सुल्तान हैदर अली से मिली, जिन्हें उन्होंने अपनी धाराप्रवाह उर्दू और बुद्धि से प्रभावित किया।
- इसके बाद गोपाल नायकर और सुल्तान हैदर अली की सेना के समर्थन से वेलु नचियार ने अपने राज्य पर फिर से नियंत्रण करने के लिए निकल पड़ी। इस ऐतिहासिक घटना के बारे में कहा जाता है कि यह वेलु नचियार और उनके सैन्य कमांडर द्वारा तैयार की गई 'आत्मघाती बमबारी का पहला उदाहरण' है।
- वेलु नचियार अंग्रेजों द्वारा कब्जा किए गए किले के शस्त्रागार कक्ष में पहुंची। इसके बाद महिलाओं की एक टीम किले में पहुंची, जहां एक महिला ने खुद पर घी डालकर आग लगा लिया और फिर शस्त्रागार कक्ष में पहुंच गई।
- महिलाओं के बलिदान ने वेलु नचियार के लिए एक हमला शुरू करने और अपना राज्य वापस जीतने में मदद की। उन्होंने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी और 'वीरमंगई' की उपाधि अर्जित की। उन्हें समर्पित 2008 में एक स्मारक डाक टिकट भी जारी किया गया है।
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