
अरावली की गोद में सुखानंद धाम
नीमच. अरावली पर्वतमाला की सुरम्य वादियों में मालवा मेवाड़ सीमा पर स्थित प्राचीन धार्मिक तीर्थ एवं पर्यटन स्थल सुखानंद धाम इन दिनों वर्षा ऋतु के आगमन से पूर्व हरियाली से सराबोर होकर श्रद्धालुओं और प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। चारों ओर हरितिमा की चादर ओढ़े पहाडिय़ां, कुछ दूरी पर स्थित नसन्नी जलाशय का मनोहारी दृश्य यहां आने वाले हर व्यक्ति को मंत्रमुग्ध कर देती है।
71 फीट ऊंचाई से गिरता प्राकृतिक जलप्रपात
सुखानंद धाम के आसपास चंदन, महुआ, खैर, खिरनी, बांस सहित विभिन्न प्रजातियों के वृक्षों से आच्छादित वन क्षेत्र फैला हुआ है। प्राकृतिक चट्टानों और कंदराओं के बीच छोटे-बड़े वन्य जीवों की चहल-पहल इस क्षेत्र को एक लघु अभयारण्य जैसा स्वरूप प्रदान करती है। मंदिर परिसर में मानसून में लगभग 71 फीट ऊंचाई से गिरता प्राकृतिक जलप्रपात तथा सैकड़ों बंदरों की अठखेलियां श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र हैं। श्रद्धालु बंदरों को चना, मूंगफली और फल खिलाते हुए लोग सेल्फी लेना नहीं भूलते।
धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है ’छोटी गंगाजी’
सुखानंद धाम को मालवा, मेवाड़, वागड़ और उपरमाल अंचल में ‘छोटी गंगाजी’ के रूप में विशेष मान्यता प्राप्त है। यहां स्थित पवित्र गंगा तालाब में अस्थि विसर्जन करने से मोक्ष प्राप्ति की लोक मान्यता है। ओर अस्थियां पानी में घुल मिल जाती है यही कारण है कि मध्यप्रदेश और राजस्थान के विभिन्न जिलों से प्रतिदिन मृत आत्माओं के परिजन यहां अस्थियां लेकर पहुंचते हैं। सावन, भादवा और अन्य प्रमुख पर्वों पर लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ यहां उमड़ती है। विधायक ओमप्रकाश सखलेचा के प्रयासों से मेला ग्राउंड से पहाड़ काटकर नया घाट मार्ग बनाया गया है, जिससे राजस्थान सीमा स्थित पहाड़ी क्षेत्र तक पहुंचना आसान हो गया है। साथ ही कीर समाज धर्मशाला के समीप से मंदिर के मुख्य द्वार तक नया सडक़ मार्ग भी निर्माणाधीन है। यह मार्ग विशेष रूप से वरिष्ठ वृद्ध नागरिकों और दिव्यांग श्रद्धालुओं के लिए राहतकारी साबित होगा, जिन्हें तब 100 से अधिक पत्थर की सीढिय़ां नहीं चढऩी पड़ेंगी। मेला परिसर में लगभग 10 हजार वर्गफीट क्षेत्रफल में विशाल डोम का निर्माण किया गया है। वहीं जावद से सुखानंद धाम तक टू-लेन सडक़ निर्माण पूर्ण होने से आवागमन और सुगम हो गया है। यहां धार्मिक आयोजनों की संख्या भी बढऩे लगी है।
प्रकृति ने दिया सब कुछ, जरूरत है दूरदर्शी योजना की
सुखानंद धाम के निकट वन विभाग की नर्सरी, टिपिया खो और बांदरिया खो जैसी विशाल प्राकृतिक कंदराएं, केनपुरिया जलाशय तथा वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास इस क्षेत्र को एक उत्कृष्ट धार्मिक-पर्यटन केंद्र बनाने की क्षमता रखते हैं। यदि नसन्नी जलाशय से सुखानंद धाम तक समग्र पर्यटन विकास योजना बनाकर वन विभाग और पर्यटन विभाग के माध्यम से विकसित किया जाए तो यह क्षेत्र प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित कर सकता है। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिल सकती है।
आस्था के केंद्र पर अव्यवस्थाओं का ग्रहण
एक ओर जहां सावन माह की तैयारियों के तहत मेला क्षेत्र में झूले, चकरी, अस्थायी दुकानें और धार्मिक गतिविधियां शुरू होने लगी हैं, वहीं दूसरी ओर व्यवस्थाओं की बदहाली गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। श्रद्धालु गणपतसिंह राठौड़ रमेश चंद्र माली का कहना है कि मंदिर परिसर, धर्मशालाओं और मेला क्षेत्र में स्वच्छता व्यवस्था चरमराई हुई है। जगह-जगह कचरे के ढेर लगे हैं। बंदरों की लीद और अन्य निराश्रित पशुओं के कारण दुर्गंध फैल रही है। विदित हो कि इस प्राचीन मंदिर की सैकड़ों बीघा बहुमूल्य भूमि पर लगातार अवैध अतिक्रमण हो रहे हैं। बावजूद इसके जिम्मेदार विभागों द्वारा प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही।
नगर परिषद को सौंपने की मांग
स्थानीय नागरिकों मदनलाल धाकड़ सुरेश कुमार शर्मा का कहना है कि पूर्व में सुखानंद धाम की व्यवस्थाएं प्रशासनिक अधिकारियों की निगरानी में बेहतर ढंग से संचालित होती थी। पिछले कुछ वर्षों से यह जिम्मेदारी छोटी ग्राम पंचायत तुंबा को सौंपे जाने के बाद व्यवस्थाओं में गिरावट आई है। विगत वर्षों ग्राम पंचायत द्वारा स्वयं प्रस्ताव पारित कर आयोजन और व्यवस्थाओं का दायित्व नगर परिषद अठाना को सौंपने की अनुशंसा की जा चुकी है। यह प्रस्ताव एसडीएम जावद और विधायक तक भी पहुंचा, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।
Published on:
24 Jun 2026 11:24 am
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