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तीन पीढ़ी का परिवार एक साथ एक ही घर में एक चूल्हे पर

- आज भी परिवार की समस्या का फैसला करते है दादा जी

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तीन पीढ़ी का परिवार एक साथ एक ही घर में एक चूल्हे पर

तीन पीढ़ी का परिवार एक साथ एक ही घर में एक चूल्हे पर


नीमच। सहयोग के अटूट बंधन से बंधे रिश्तों की मजबूत डोर को ही परिवार कहते हैं...। कहा भी गया है कि परिवार से बड़ा कोई धन नहीं होता है, पिता से बड़ा कोई सलाहकार नहीं होता है। मां के आंचल से बड़ी कोई दुनिया नहीं, भाई से अच्छा कोई भागीदार नहीं, बहन से बड़ा कोई शुभचिंतक नहीं। इसलिये परिवार के बिना जीवन की कल्पना करना कठिन है। कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिये हुए लॉकडाउन ने संयुक्त परिवारों की अवधारणा को तो मजबूती दी है। परिवारों के सदस्यों के बीच की दूरियों को भी कम कर दिया है। अभी तक बुजुर्ग अकेले रहते थे। लॉकडाउन के दौरान दादा-दादी का महत्व लोगों ने जाना और नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच दूरियां भी काफी कम हो गईं। सामाजिक संस्था कहलाने वाले परिवार ने ही इस चुनौती भरे समय में लोगों को जोड़कर रखा है और दुख व सुख में सब एक-दूसरे का साथ देते नजर आए हैं। परिवार के महत्व और उसकी उपयोगिता को प्रकट करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 15 मई को सम्पूर्ण विश्व में अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाता है।

पत्रिका ने अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस पर जिला मुख्यालय से महज आठ किलोमीटर दूर रेवली देवली गांव जाकर एक परिवार से बातचीत की दिन की तीन पीढ़ी एक साथ एक ही घर में एक चुल्हे पर रह रही है और अब चौथी पीढ़ी की भी शुरूआत हो गई है। जी हां हम बात कर रहे रेवली देवली निवासी ८५ वर्षीय कन्हैयालाल नागदा के परिवार की। इस वैश्विक भागदौड़ की जिदंगी में जहां एकांकी परिवार है। वहीं गांव में नागदा परिवार संयुक्त रूप से रहकर बड़ी मिशाल बना हुआ है। पत्रिका से बातचीत के दौरान कन्हैयालाल नागदा ने बताया कि वह काश्तकार है। उनकी आयु करीब ९५ वर्ष है और पत्नी कावेरी की आयु करीब ८८ वर्ष है। सबसे बड़ा बेटा विष्णुप्रदसाद उम्र ७२ वर्ष कॉपरेटिव बैंक में प्रबंधक है, उनकी पुष्पा बाई की उम्र ७० वर्ष है। उनके भी दो बेटे दिलीप उम्र ३८ और अनिल उम्र ३५ वर्ष है। दिलीप टीचर और अनिल बैंक में कार्यरत है। दोनों की शादी हो गई बहू कृष्णा उम्र ३५ और रवीना उम्र ३२ वर्ष है। उनके भी बच्चें है। वहीं दूसरे नंबर पर बेटाकंवरलाल नागदा उम्र ६५ वर्ष उनकी पत्नी गीता बाई ६२ वर्ष की है। यह शासकीय शिक्षक है। इनके एक बेटा उमेश उम्र ३७ वर्ष और बहू सपना ३५ वर्ष है। उमेश काश्तकारी करता है। जबकि सबसे छोटा बेटा दशरथ नागदा उम्र ४७ वर्ष, उनकी पत्नी संतोषी बाई की उम्र ४५ वर्ष है। दशरथ तुलावटी का कार्य करते है। इनके बेटा दीपक नागदा उम्र २० वर्ष पढ़ाई कर रहे है, जिसकी भी शादी हो चुकी है, बहू कृष्णा बाई उम्र १८ वर्ष है। पूरा परिवार एक साथ रहता है, आज भी एक ही चूल्हे पर सभी का खाना बनता है और पुश्तेनी जमीन १५ बीघा में अभी तक कोई बंटवारा नहीं हुआ और कभी यह बात भी सामने नहीं है आई है।

घर के मुखिया परिवार के सबसे बड़े
दशरथ नागदा ने पत्रिका को बताया कि संयुक्त परिवार का अपना अलग ही आनंद है। बच्चों में संस्कार विकसित होते है। बड़े बूढों का प्यार और आर्शीवाद मिलता है। वहीं कम खर्च में परिवार का गुजर बसर होता है। देखने में आया है कि एकांकी परिवार में पति-पत्नी के रिश्ते में भी दरारे आ जाती है, उन्हें समझाने वाला कोई नहीं होता है। लेकिन आज भी घर परिवार के छोटे-मोटे विवाद होने पर पिताजी कंवरलाल नागदा जी ही जो फैसला करते है, सभी को मान्य होता है और वह सही निर्णय देते हैं। जिस कारण परिवार संयुक्त रूप से चल रहा है। एक-दूसरे के सुख दुख में तुरंत खड़े रहते हैं।

समाजशास्त्रियों से बातचीत
संकट में पता चलता एकजुटता का महत्व
परिवार एक नींव हैं, जहां हर तरह का संस्कार मिलता है। उस संस्कार के द्वारा ही व्यक्ति ही फलता व फूलता है और समाज को कुछ देने लायक बनता है। परिवार ही नहीं रहा तो कुछ काम नहीं आयेगा। घर के लिये ही आदमी काम करता है। संकट के समय में और भी अधिक लगता है कि परिवार के साथ रहेंगे तो एकजुट होकर रहेंगे। सभी प्रकार के कष्टों का सामना भी कर सकेंगे। वर्तमान परिस्थिति में भी यह देखने को मिल रहा है। परिवार के बिना व्यक्ति नहीं है और व्यक्ति के बिना परिवार नहीं है।
- डॉ. संजय जोशी, समाजशास्त्री शासकीय कॉलेज नीमच