
इंद्रजीत खन्ना,पूर्व मुख्य सचिव, राजस्थान
अमिताभ से मेरी दोस्ती पिछले 67 सालों से हैं, मार्च 1956 से। जब उन्होंने नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में प्रवेश लिया था। हम दोनों एक ही कक्षा में थे। कक्षा में 29 छात्र थे। बोर्डिंग स्कूल में रहने के नाते हमारी दोस्ती इसलिए भी गहरी होती गई कि हम एक ही कक्षा के थे और चौबीस घंटे एकसाथ रहते थे। अपने माता-पिता और परिवार से दूर। स्वाभाविक ही है कि ऐसी दोस्ती कभी टूटती नहीं है। अमिताभ एक सुपरस्टार है। उन्होंने देश का नाम रोशन किया है लेकिन उन्हें इसका जरा भी गुमान नहीं। एक बार मुम्बई में उनसे मिलना हुआ। मैंने उनसे बातों-बातों में कह दिया कि मैं तो अक्सर मुम्बई आता रहता हूं लेकिन उनकी व्यस्तता का अंदाज करते हुए उनके पास नहीं आता। उन्होंने पलक झपके बिना जबाव दिया-'मेरे पास तो दोस्तों के लिए समय ही समय है।'
अभिनय के साथ अच्छे बॉक्सर भी हैं अमिताभ
आइए, स्कूली दिनों की ओर लौटते हैं। वह पढ़ाई में काफी होशियार थे, साथ ही नाटकों में भी हिस्सा लेते थे। हिन्दी और अंग्रेजी में हर साल होने वाले नाटकों में उनकी भूमिका मुख्य किरादर की होती थी। मैं भी भाग लेता था, पर उतना ही...। एक बात और बता दूं। उन्हें अभिनय का ही शौक नहीं था। वे एक अच्छे बॉक्सर भी थे। मेरे लिए यह कहना ज्यादा आसान है कि एंग्री यंग मैन के गुण स्कूली दिनों से ही उनमें थे।
तब नियम लगते थे बुरे, अब पता चला कैसे आया अनुशासन
अमिताभ में शेरवुड की महक आज भी गूंजती है। कुछ साल पहले उन्होंने जुहू के एक कॉलेज में शेरवुड की यादें ताजा करते हुए कहा था- मैंने बोर्डिंग स्कूल में रहकर पढ़ाई की है। नैनीताल के शेरवुड में । वहां मैंने बहुत कुछ सीखा जिसका मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव है। यह मेरी पीढ़ी और वर्तमान पीढ़ी के बीच निरंतरता को सक्षम बनाने वाला है। शेरवुड में मुझे जो सबसे बड़ी शिक्षा मिली, वह है चरित्र की। शेरवुड का आदर्श वाक्य था- 'मेरेट क्विस्क पालम' (यह लेटिन भाषा के शब्दों का समूह है)। इसका मतलब है हरेक को अपने स्वयं के पुरस्कार का हकदार बनने दें...। इसलिए पुरस्कार लेने में सक्षम होने के लिए प्रत्येक को मेधावी होना होगा। दूसरी बात, स्कूल का प्रशिक्षण ही अनुशासन होता है। मुझे बोर्डिंग स्कूल के नियम कि, कब उठना है, कब जूतों पर पॉलिश करनी है, कब ड्रेस पहननी है, पसंद नहीं थे या मैं उनसे सहमत नहीं था। लेकिन मैं आपको बता दूं कि अगर यह प्रशिक्षण नहीं मिला होता तो मैं आज अपनी खुद की गरिमा से वंचित ही रह जाता। अच्छी शिक्षा के जरिए हासिल ज्ञान का मूल्य केवल जानकारी प्राप्त करने से कहीं ज्यादा होता है। उन्होंने कई बार कहा है कि स्कूल में उन्हें जो शिक्षा मिली, उसने जीवन भर उनका साथ दिया है। यहां यह भी बता दें कि फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ भी शेरवुडियन थे। उन्होंने 1930 के दशक में वहां पढ़ाई की थी। 1969 में जब स्कूल का शताब्दी समारोह मनाया जा रहा था, उसमें वह मुख्य अतिथि थे। पुरातन छात्र होने के नाते मुझे भी समारोह में भाग लेने का सौभाग्य मिला था।
सभी शिक्षकों के लिए सम्मान
अमिताभ के शेरवुड के प्रति लगाव को लेकर दो अन्य उदाहरण भी आपको बताना चाहूंगा। नवम्बर 2003 में शेरवुड के पुरातन छात्रों ने प्रिंसिपल रिचर्ड माउंटफोर्ड के सम्मान में मुम्बई में दो दिवसीय कार्यक्रम (डिनर एंड प्ले) का आयोजन किया। लगभग 30 वर्षों तक स्कूल की सेवा करने के बाद प्रिंसिपल माउंटफोर्ड सेवानिवृत्त हो रहे थे। हालांकि, हमने उनके कार्यकाल में शेरवुड में पढ़ाई नहीं की थी, फिर भी अमिताभ के अलावा मुझे और मुंबई के एक अन्य सहपाठी सुंदर अवत्रमणि को भी आमंत्रण दिया गया था। अमिताभ ने दोनों आयोजनों में भाग लिया। डिनर के दौरान उन्होंने हमारे समय के प्रिंसिपल लेवेलिन, जो रिटायर्ड होने के बाद लंदन में बस गए थे और उनकी उम्र 90 वर्ष की हो रही थी, से फोन पर बात करने की इच्छा जाहिर की। हम तीनों ने उनसे फोन पर बात की। यह जताता है कि अमिताभ के मन में अपने सभी शिक्षकों के लिए कितना सम्मान है।
कुली की तरह सर पर बोझ उठा कर बनाया था स्कूल का स्वीमिंग पूल
एक बात पर गौर करना चाहता हूं। क्या मैं फिल्म 'कुली' में उनकी अविस्मरणीय भूमिका और हमारी स्कूली गतिविधियों में कोई संबंध तालश सकता हूं? इसका जवाब –हां- में है। 1956-57 में स्कूल में एक स्वीमिंग पूल बनाया जा रहा था। इस निर्माण ने अमिताभ समेत हम छात्रों के बीच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से श्रम की गरिमा का सम्मान पैदा किया है। कक्षा के बाद हम छात्र स्वेच्छा से निर्माण स्थल पर जाते थे। बोल्डर और पत्थरों को तसले पर रखते, उसे सिर पर उठाते और फिर पत्थरों को खड्ड की तरफ फेंक देते थे। आप स्वींमिग पूल की साइट पर और 'कुली' फिल्म में अमिताभ की भूमिका, जहां वह यात्रियों का सामान सिर पर ले जा रहे हैं, का एक सम्बंध देख सकते हैं।
नहीं भूले क्लासमेट के नाम और बचपन की प्रार्थना
शेरवुड कॉलेज का हर साल 5 जून को स्थापनी दिवस मनाया जाता है। 2008 में, हम 1958 के छात्रों ने इसमें भाग लेने का निश्चय किया। हमारे स्कूल छोड़े 50 साल हो रहे थे और स्कूल छोड़ने का यह हमारा जुबली ईयर भी था। हमारी कक्षा के 29 छात्रों में से 16 परिवार समेत इसमें आए। अमिताभ भी जया जी, पुत्र अभिषेक और बहू ऐश्वर्या के साथ आए। वैसे तो उनके साथ अनेक रोमांचक भरी यादें हैं लेकिन तीन ऐसे प्रसंग हैं जिन्हें साझा करना चहूंगा। 3 जून 2008 को हम 15 क्लासमेट उनसे मिले। उन्होंने सबको गले लगाया, हालचाल पूछे। उन्हें सभी के नाम भी याद थे। हालांकि ज्यादातर क्लासमेट्स से वह 50 साल बाद मिल रहे थे। डिनर के दौरान हमने चर्चा की कि स्कूल के लिए कुछ करना चाहिए। अमिताभ ने सुझाव दिया कि हमें महज दिखावे के बजाय कुछ बड़ा करना चाहिए। कैसे, क्या हो, इस पर सभी से चर्चा करने के बाद हमने निश्चय किया कि स्कूल को सबसे ज्यादा जरूरत छात्राओं के लिए एक अतिरिक्त छात्रवास की जरूरत है। 600 लड़कों की तुलना में छात्राओं की संख्या केवल 50 ही थी। हमारे समय में केवल छात्र ही यहां पढ़ते थे। 1980 के दशक में यह को-एजूकेशनल हो गया। छात्रावास के लिए जगह की कमी से छात्राओं की संख्या बढ़ाना संभव नहीं था। हम सभी ने आर्थिक योगदान किया। अमिताभ का योगदान सबसे ज्यादा रहा और पूरी तरह गुप्त। प्राचार्य और मुझे छोड़कर किसी भी सहपाठी को उनके 'गुप्त दान' के बारे में नहीं मालुम। बाइबल का एक कथन- 'तुम्हारा दान गुप्त रहे और तुम्हारा पिता जो चुपचाप देख रहा है, वह तुम्हें खुले में प्रतिफल देगा' अमिताभ पर बिल्कुल सटीक बैठता है।
तीसरा प्रसंग, 4 जून के आयोजन से जुड़ा है। शाम को तेज बारिश हुई। हम 16 क्लासमेट अपनी पत्नियों के साथ प्रिंसिपल के घर बैठे हुए थे। लगा कि अब कार्यक्रम नहीं हो सकेगा। तभी अमिताभ ने अपने खास अंदाज में कहा, 'कुछ भी हो जाए, मैं छात्रों को निराश नहीं करूंगा क्योंकि उन्होंने एक माह से अधिक समय तक बहुत कड़ी मेहनत की है।' कार्यक्रम हुआ और आधी रात तक चला। हम सभी प्रिंसिपल साहब के घर खाना खाने गए। प्रिंसिपल साहब ने अमिताभ से 'ग्रेस' कहने का अनुरोध किया। अमिताभ ने बहुत विनम्रता से वह प्रार्थना कही जो हम स्कूल में हर दिन भोजन से पहले और बाद में कहा करते थे। वह 50 साल बाद भी यह प्रार्थना नहीं भूले थे।
लेट हुए तो खुद चले आए मेरी बहन के घर
अमिताभ की विनम्रता से जुड़ी दो प्रसंग और हैं। 1972 में, मैं अपनी पत्नी के साथ मुम्बई गया था। मैंने अमिताभ को फोन कर मिलने का समय मांगा। वह मुम्बई के एक रेस्टोरेंट में फिल्म ‘बम्बई टू गोवा’ की शूटिंग कर रहे थे। उन्होंने वहीं बुला लिया और 15 मिनट तक बात की। फिर रात में 8 बजे मैरीन ड्राइव पर एक रेस्टोरेंट में मिलने का कार्यक्रम तय हुआ। मैं पत्नी समेत तय वक्त पर वहां पहुंच गया। लेकिन अमिताभ का कोई पता नहीं। फिर मैं काउंटर पर एक मैसेज छोड़कर कोलाबा स्थित अपनी बहन के घर आ गया। अमिताभ किसी समय रेस्टोरेंट पहुंचे। वहीं से मुझे फोन किया और देर से आने के लिए माफी मांगी। वह रात में ही मेरी बहन के घर आए। हमने थोड़ी देर बात की। जब तक लोगों को पता चलता कि वह बिल्डिंग में है, उन्हें निकलने के लिए मजबूर हुए। इस प्रसंग से पता चलता है कि उन्हें साधारण जगह भी जाने में कोई दिक्कत नहीं होती है।
एक अन्य घटना जनवरी 2009 की है। अमिताभ किसी आयोजन के सिलसिले में जयपुर में थे। मैंने उनकी सचिव को फोन किया और मुलाकात की बात कही। सचिव ने टाइम तय कर दिया। मैं उनसे होटल में मिला। एक घंटे तक बात की। मैंने उनसे अपने घर आने के लिए कहा। वह अगले दिन अल-सुबह आने को तैयार हो गए। वह आए। पुराने दिन ताजा किए। श्रीमती खन्ना और हमारी साढ़े तीन साल की पोती ने भी उनसे बातचीत की। जब उन्होंने छोटी बच्ची को गोद में उठाया तो वह आश्चर्य में रह गई क्योंकि उसने कुछ ही दिन पहले उनकी 'भूतनाथ' फिल्म देखी थी। उनकी बेमिसाल विनम्रता।
दोस्तों से मिल कर बोले ऐसी मुलाकातें बार बार हो
सबसे हालिया प्रसंग 21 फरवरी 2023 का है। हमारे क्लासमेट भारत भार्गव ने नवम्बर 2022 में मुझे लिखा कि वह और उसकी पत्नी अमरीका से कुछ दिनों के लिए मुम्बई आएंगे और अमिताभ से भी मिलना चाहेंगे। मैंने अमिताभ को लिखा। उनका जवाब आया कि अभी कुछ कह पाना थोड़ा जल्दबाजी होगी लेकिन फरवरी 2023 की शुरुआत में मैं मुलाकात कर सकूंगा। 01 फरवरी को उन्होंने मिलने का समय तय कर दिया। इस मुलाकात में हमारे दो अन्य क्लासमेट चंडीगढ़ से सुखपाल सिंह बाजवा और दिल्ली से जसपाल सिंह भी शामिल हुए। दोनों की उम्र 80 से ज्यादा की है। अमिताभ सभी से मिलकर बहुत खुश हुए। 2008 में नैनीताल में हुई भेंट के बाद यह पहली मुलाकात थी। उन्होंने पूरी तरह दोस्तों को समय दिया। अभिषेक भी हमारी बातचीत का आनन्द उठाता रहा। वह अपने दादा के स्कूली दिनों को सुनकर आत्मविभोर हो रहा था। शाम को मैंने व्हाट्सएप पर उनका शुक्रिया अदा किया तो उनका जवाब आया-'आप सभी का साथ पाकर खुशी मिली। ऐसी मुलाकात बार-बार हो।' स्कूली दोस्तों के प्रति उसके रिश्ते और स्नेह की यह मिसाल है।
अमिताभ जिस तरह अपनी दिनचर्या को हैंडल करते हैं, मैं आश्चर्य में हूं। निश्चित रूप से वह अपने जिन्दगी में बहुत ही अनुशासित और व्यवस्थित हैं। और ये दोनों गुण उन्हें शेरवुड से ही मिले हैं। देर रात तक काम करना और सुबह जल्दी उठकर काम पर निकल जाना उनके अनुशासित जीवन से ही सम्भव है।
Published on:
11 Oct 2023 09:27 am
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