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केंद्र ने कहा, भारतीय न्यायिक सेवा के प्रस्ताव पर सहमति नहीं

- ग्यारह साल से चल रही कवायद हितधारकों में मतभेदों के कारण नहीं चढ़ पा रही सिरे

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केंद्र ने कहा, भारतीय न्यायिक सेवा के प्रस्ताव पर सहमति नहीं

केंद्र ने कहा, भारतीय न्यायिक सेवा के प्रस्ताव पर सहमति नहीं

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने गुरुवार को राज्यसभा में माना कि देश में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (एआईजेएस) स्थापित करने के प्रस्ताव पर पिछले 11 साल से चल रही कवायद प्रमुख हितधारकों में मतभेदों के चलते सिरे नहीं चढ़ पा रही है। ऐसे में एआईजेएस के प्रस्ताव पर कोई सहमति नहीं है।

विधि एवं न्याय राज्यमंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने प्रश्नकाल के दौरान कांग्रेस के राजीव शुक्ला के सवाल के लिखित जवाब में कहा कि संविधान का अनुच्छेद 312 एआईजेएस की स्थापना का अनुबंध करता है। इसके तहत जिला न्यायाधीश पद से इस सेवा के माध्यम से न्यायिक अधिकारियों का चयन किया जा सकता है। इसके लिए तैयार प्रस्ताव को नवम्बर 2012 में सचिवों की समिति ने अनुमोदित किया था। अप्रेल 2013 में मुख्यमंत्रियों व उच्च न्यायलयों के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में प्रस्ताव को एक एजेंडा के रूप में शामिल किया गया। इस पर अधिक विचार विमर्श की जरूरत समझते हुए राज्य सरकारों व उच्च न्यायालयों से राय मांगी गई।

उन्होंने बताया कि एआईजेएस का कुछ राज्य सरकारों व हाईकोर्ट ने समर्थन किया, जबकि कुछ इसके समर्थन में नहीं थे। कुछ केंद्र सरकार के प्रस्ताव में बदलाव चाहते थे। इसके बाद 5 अप्रेल 2015 को हुए सम्मेलन में भी प्रस्ताव पर कोई प्रगति नहीं हुई। प्रस्ताव पर 16 जनवरी 2017 को तत्कालीन विधि मंत्री की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय बैठक में पात्रता, आयु, चयन मापदंड, योग्यता व आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा हुई। मार्च 2017 में संसदीय सलाहकार समिति व 22 फरवरी 2021 को अजा-जजा कल्याण संबंधी संसदीय समिति की बैठक में भी प्रस्ताव पर विचार हुआ। आखिरी बार 30 अप्रैल 2022 को सीएम-सीजे कॉन्फ्रेंस में एआईजेएस का प्रस्ताव एजेंडे के रूप में शामिल नहीं किया जा सका। मुख्य हितधारकों में मतभेद अब भी बरकरार है।

सुप्रीम कोर्ट में एक भी पद रिक्त नहीं

एक अन्य प्रश्न के उत्तर पर मेघवाल ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों का एक भी पद रिक्त नहीं है। सभी 34 पद भरे हुए हैं। उच्च न्यायालयों में 1114 न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या की तुलना में 790 न्यायाधीश कार्यरत हैं। न्यायाधीशों के 324 पद रिक्त हैं।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष एक जनवरी तक उच्च न्यायालय कॉलेजियमों से प्राप्त 171 प्रस्ताव प्रक्रियाधीन हैं। इस वर्ष विचारार्थ 292 प्रस्तावों में से 110 न्यायाधीशों की नियुक्ति की गई और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम (एससीसी) की सलाह पर 60 सिफारिशें उच्च न्यायालयों को भेज दी गई। गत 4 दिसम्बर तक 122 प्रस्तावों में से 87 एससीसी को सलाह के लिए भेजे गए थे। इनमें से एससीसी ने 45 पर अपनी राय से अवगत करवा दिया है और 42 अब भी एससीसी के विचाराधीन हैं। हाल ही प्राप्त 35 नए प्रस्ताव प्रक्रियागत हैं। बाकी 198 रिक्तियों पर सिफारिशें आनी बाकी हैं।

देश के उच्च न्यायालयों में 111 महिला न्यायाधीश

देश के 26 उच्च न्यायालयों में 111 महिला न्यायाधीश कार्यरत हैं। सुप्रीम कोर्ट में महिला न्यायाधीशों की संख्या तीन है।

विधि राज्यमंत्री अर्जनराम मेघवाल ने गुरुवार को राज्यसभा में बताया कि सर्वाधिक 15 महिला न्यायाधीश पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में हैं। इनरे अलावा मद्रास हाईकोर्ट में 12, बम्बई में 11, दिल्ली में 9, गुजरात व कलकत्ता में 8-8 और कर्नाटक व तेलंगाना हाईकोर्ट में 7-7 महिला न्यायाधीश हैं। राजस्थान में तीन, मध्यप्रदेश में दो और छत्तीसगढ़ में एक महिला न्यायाधीश कार्यरत हैं। त्रिपुरा, उत्तराखंड, मेघालय हाईकोर्ट में एक भी महिला न्यायाधीश नहीं हैं।

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