8 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

profile_icon

प्रोफाइल

SC का बड़ा फैसला : निवेशक कितने भी हों षडयंत्र एक तो FIR भी एक ही काफी

Court Order सुप्रीम कोर्ट ने NCT की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए यह फैसला दिया।

4 min read
Google source verification
supreme Court

प्रतीकात्मक फोटो

Court Order : सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है अगर एक ही षडयंत्र से बहुत अधिक लोगों के साथ अपराध हुआ हो तो ऐसे मामलों में एक सभी पीड़ितों की अलग-अलग FIR की आवश्यकता नहीं है। ऐसे मामलों में एक ही FIR काफी है। एक FIR दर्ज करके दूसरे पीड़ितों को 161 के बयानों के आधार पर उसी FIR में जोड़ लिया जाए।

दिल्ली हाइकोर्ट के पुराने फैसले को किया रद्द

यह निर्णय अदालत ने दिल्ली राज्य यानी NCT की अपील की सुनवाई के दौरान दिया। अदालत ने अपील को स्वीकार कर लिया और कहा कि ऐसे मामलों में जहां एक ही आपराधिक साजिश रची गई हो और उसके कारण बड़ी संख्या में निवेशकों के साथ धोखाधड़ी हुई हो तो ऐसे मामलों में एक FIR दर्ज करना और दूसरी शिकायतों को आपराधिक प्रक्रिया संहिता ( CRPC ) की धारा 161 के तहत बयान के तौर पर मान लेना या केस डायरी में दर्ज कर देना ​​कानूनी तौर पर सही है। यह कहते हुए अदालत ने वर्ष 2019 में दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को निरस्त कर दिया जिसमें प्रत्येक निवेशक के लिए अलग-अलग FIR दर्ज करने की बात कही गई थी।

उदाहरण से समझिए इससे क्या होगा

उदाहर के तौर पर हम इस फैंसले को इस तरह से समझते हैं कि, एक कॉलोनाइजर ने एक हजार फ्लैट बनाने की बात कही और एक हजार लोगों से इसके लिए एडवांस रकम ले ली। बाद में यह कॉलोनी डवलप नहीं हुई या कॉलोनाइजर ने निवेशकों के साथ कोई फ्रॉड कर दिया तो ऐसे मामलों में एक हजार FIR दर्ज करने की आवश्यकता नहीं होगी। एक ही FIR में सभी एक हजार लोगों के बयान दर्ज कर लिए जाएंगे और उन्हे एक तरह से मुख्य आरोप के सपोर्ट में रखा जाएगा। ऐसे लोग आरोप को सिद्ध करने के लिए गवाह बनेंगे। अदालत ने कहा कि अगर एक ही FIR में बाकी लोगों को गवाह के रूप में जोड़ लिया जाएगा तो इससे अपराध की प्रवृत्ति कम न हीं होगी और ना ही इससे दंड के प्राविधान पर कोई असर पड़ेगा। इसलिए एक ही FIR पर्याप्त है।

ये है पूरा मामला

लाइव-लॉ के अनुसार, यह आदेश जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने दिया है। बेंच के समक्ष राज्य दिल्ली ( NCT ) की ओर से एक अपील दायर की गई। इस अपील को बेंच ने मंजूरी दे दी। यह अपील इस प्रकार थी कि, दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने 2009 में एक FIR दर्ज की। इस FIR में आरोप थे कि, अशोक जडेजा और उसके साथियों जिनमें खिमजी भाई जडेजा भी शामिल हैं, मिलकर निवेशकों से कहा कि आपके पैसे तीन गुना कर देंगे और इस तरह एक झूठा प्रलोभन देकर करीब 1 हजार 852 निवेशकों से कथित तौर पर लगभग 46.40 करोड़ रुपये की ठगी कर ली। इस मामले में एक ही FIR दई की गई। बाकी निवेशकों की शिकायतों को बयान के तौर पर मानते हुए केस डायरी में जोड़ लिया गया। इस मामले में जब आरोपी पक्ष की ओर से जमानत की अर्जी दी गई तो ट्रायल कोर्ट ने CRPC की धारा 395 (2) के तहत दिल्ली हाईकोर्ट को दो सवाल भेजे। इन सवालों में पूछा गया कि, क्या हर जमा एक अलग लेन-देन है जिसके लिए अलग FIR और चार्जशीट की ज़रूरत है। दूसरे सवाल में पूछा गया कि, क्या सभी मामलों को एक साथ मिलाने से सजा कम हो जाएगी ? दिल्ली हाईकोर्ट ने इनके जवाब में लिखा कि, एक आपराधिक साज़िश के तहत बड़ी संख्या में निवेशकों या जमाकर्ताओं को लुभाने और धोखा देने के मामले में हरेक निवेशक का अलग और व्यक्तिगत लेन-देन है। ऐसे सभी लेन-देन को एक निवेशक की शिकायत में रखकर दूसरे पीड़ितों को गवाह दिखाकर एक ही FIR में नहीं मिलाया जा सकता। दूसरे सवाल के जवाब में दिल्ली हाइकोर्ट ने कहा कि, हर FIR के संबंध में एक अलग फाइनल रिपोर्ट फाइल करनी होगी। अलग-अलग FIR के संबंध में फाइल की गई फाइनल रिपोर्ट को मिलाने का कोई सवाल ही नहीं है। CRPC की धारा 219 के अनुसार फाइनल रिपोर्ट को मिलाने पर कोर्ट यानी मजिस्ट्रेट तय करेंगे और इसी दौरान विचार होगा।

ये दी गई दलील

सीनियर एडवोकेट आर बसंत को इस मामले में एमिक्स क्यूरी नियुक्त किया गया था। उन्होंने हाईकोर्ट के इस नज़रिए का विरोध करते हुए कहा कि यह रेफरेंस ही समय से पहले था। उस वक्त जांच चल रही थी और वर्तमान में ही जांच चल ही रही है। अभी पुलिस को अपनी जांच में यह तय करना था कि, कथित कार्य CRPC की धारा 220 और 223 के तहत एक ही ट्रांजैक्शन का हिस्सा था। इस मामले में दूसरी FIR भी इन्ही आरोपों को बताती थी। इसलिए एक ही FIR दर्ज करना सही था। भले ही इस मामले में कई FIR दर्ज की गई हों लेकिन कानून के नजरिए से इन्हे एक साथ मिलाना जायज था। उन्होंने कहा कि यह सवाल उस समय आता है जब चार्ज तय होना है। जांच की स्टेज पर यह तय करना कानून रूप से ठीक नहीं।

बेंच ने कहा शुरू से ही गलती की गई

सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील को स्वीकार करते हुए माना कि हाईकोर्ट ने शुरुआत में ही अलग-अलग FIR अनिवार्य बताकर गलती की है। बेंच ने कहा कि मुख्य मुद्दा यह था कि क्या अपराध "एक ही ट्रांजैक्शन" का हिस्सा थे ? जिसे केवल जांच के बाद ही तय किया जा सकता है। बेंच ने कहा कि, इस मामले में क्योकि साज़िश का आरोप है जिससे अलग-अलग लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी के कई काम हुए है। इसलिए दिल्ली पुलिस ने एक FIR दर्ज करके और 1851 अन्य शिकायतकर्ताओं से मिली शिकायतों को CRPC की धारा 161 के तहत बयान के तौर पर मानकर जो तरीका अपनाया वह ठीक था।