
Supreme Court: किसी भी मामले में अक्सर कोर्ट के फैसले पर किसी न किसी पक्ष की तरफ से आपत्ति जताई जाती है। सही फैसला न सुनाने का भी आरोप लगाया जाता है। कई बार यह भी कहा जाता है कि जज साहब ने यह फैसला बाहरी प्रभाव में आकर सुनाया है। अब इन्हीं सब आरोपों पर विराम लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने जजों को नसीहत देते हुए कहा है कि जजों को सही फैसला लेने में कभी भी हिचकिचाना नहीं चाहिए, भले ही उससे उनके प्रमोशन या एक्सटेंशन पर असर पड़े या सत्ता में बैठे लोग नाराज हो जाएं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की ताकत तभी दिखती है जब जज बिना डर के संविधान के अनुसार फैसले लेते हैं।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, केरल हाईकोर्ट में आयोजित दूसरे टी.एस. कृष्णमूर्ति अय्यर मेमोरियल लेक्चर में बोलते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ज्यूडिशियल रिव्यू, यानी अदालतों की समीक्षा की शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए जजों में हिम्मत और मजबूत विश्वास होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि कई बार अदालतों को कानून को असंवैधानिक घोषित करना पड़ता है, सरकार के फैसलों पर रोक लगानी पड़ती है और कभी-कभी राजनीतिक बहुमत से किए गए संवैधानिक संशोधनों को भी रद्द करना पड़ता है। ऐसे फैसलों के राजनीतिक असर भी होते हैं, इसलिए यह काम आसान नहीं होता।
आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि जजों को यह डर नहीं होना चाहिए कि किसी फैसले से उनके करियर पर असर पड़ेगा या वे सत्ता में बैठे लोगों की नाराजगी झेलेंगे। उन्होंने कहा कि हर जज का सबसे बड़ा कर्तव्य संविधान और अपनी शपथ के प्रति ईमानदार रहना है। अगर जज करियर के डर से फैसले लेने लगेंगे तो ज्यूडिशियल रिव्यू सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाएगा। अपने भाषण में उन्होंने H. R. खन्ना का उदाहरण भी दिया। उन्होंने बताया कि इमरजेंसी के दौरान एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामले में सुप्रीम कोर्ट के ज्यादातर जजों ने सरकार के पक्ष में फैसला दिया था। उस समय जस्टिस खन्ना ने अकेले असहमति जताई और कहा कि आपातकाल में भी नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार खत्म नहीं किए जा सकते।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इस फैसले की वजह से जस्टिस खन्ना को बाद में चीफ जस्टिस बनने का मौका नहीं मिला, लेकिन इतिहास ने उनके साहस को सही साबित किया। बाद में जस्टिस K. S. Puttaswamy v. Union of India मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ADM जबलपुर के फैसले को गलत बताते हुए नागरिकों के मौलिक अधिकारों की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि यह उदाहरण बताता है कि संवैधानिक ईमानदारी और साहस लंबे समय में हमेशा सही साबित होते हैं।
Published on:
05 Mar 2026 12:39 pm
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