घुटने की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए नई टेक्नोलॉजी के अनुरूप नी रिप्लेसमेंट सर्जरी (Knee Replacement Surgery) को शुरू किया गया है। इस सर्जरी के जरिए फुली एक्टिव रोबोटिक टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से बिना टिश्यू को नुकसान पहुंचाए, कम ब्लड निकालेऔर घुटने की गहराई तक कम चीरफाड़ किए सर्जरी को अंजाम दिया जाता है। दिल्ली के सीके बिरला हॉस्पिटल में इसकी शुरुआत की गई है। हॉस्पिटल के ऑर्थोपेडिक्स विभाग के डॉ अश्वनी मैचंद ने इस टेक्नोलॉजी के बारे में विस्तार से बताया है।
दिल्ली के पंजाबी बाग स्थित सीके बिरला हॉस्पिटल में गुरुवार को प्रेसवार्ता करते हुए हॉस्पिटल के ऑर्थोपीडिक्स विभाग के डॉ अश्वनी मैचंद ने अस्पताल में शुरू की गई फुली एक्टिव रोबोटिक मिनिमली इनवेसिव सर्जिकल (MIS) नी रिप्लेसमेंट सर्जरी के बारे में जानकारी दी। अस्पताल की तरफ से दावा किया गया है कि फुली एक्टिव रोबोटिक टेक्नोलॉजी के अनुरूप यह भारत में पहला नी रिप्लेसमेंट प्रोग्राम है। इस टेक्नोलॉजी के बारे में डॉ अश्वनी मैचंद ने बताया कि मौजूदा परंपरागत नी रिप्लेसमेंट सर्जरी की तुलना में रोबोटिक आर्म और कंसोल के सहयोग से सिर्फ 12 मिनट में सर्जरी की जा सकती है। इससे घुटने के ऊपर की मांसपेशियों पर व घुटने के इर्द-गिर्द कम चीड़फाड़ किए, बिना टिश्यू को नुकसान पहुंचाए और कम ब्लड निकाले सर्जरी की जाती है। अभी ट्रेडिशनल तरीके से 45 मिनट में सर्जरी होती है। मौजूदा समय में भारत में हर साल 2.5 लाख से ज्यादा लोग नी रिप्लेसमेंट सर्जरी कराते हैं। यह संख्या पांच साल पहले के मुकाबले लगभग 3 गुना बढ़ चुकी है। रोबोटिक टेक्नोलॉजी के उपयोग से नी रिप्लेसमेंट सर्जरी व अन्य प्रकार की सर्जरी को करने की प्रक्रिया में भी बढ़ोतरी हो रही है। अब इसकी तरफ लोग भी दिलचस्पी दिखाने लगे हैं। प्रेसावर्ता में अस्पताल के चीफ बिजनेस ऑफिसर विपुल जैन और यूनिट हैड डॉ अमित शर्मा भी मौजूद रहे।
कंसोल से होती है 3डी सिटी स्कैन, एक दिन पहले हो जाती है प्लानिंग
डॉ अश्वनी मैचंद ने बताया कि फुली एक्टिव रोबोटिक टेक्नोलॉजी में कंसोल और रोबोटिक आर्म के जरिए नी रिप्लेसमेंट सर्जरी को किया जाता है। इसमें कंसोल में मरीज के घुटना का 3डी सिटी स्कैन होता है। इसमें घुटने की सर्जरी को लेकर पुरी तरह से कई पैरामीटर्स पर विश्लेषण किया जाता है। जिसमें किस तरह से सर्जरी करनी है और घुटने के ज्वाइंट के क्षतिग्रस्त टिश्यू को हटाकर इसे कृत्रिम ज्वाइंट से बदलने की प्रक्रिया की पूरी प्लानिंग की जाती है। यह प्लानिंग सर्जरी से एक दिन पहले होती है। हालांकि, सर्जरी के दिन डॉक्टर अपनी इच्छा के अनुसार कुछ बदलाव करना चाहें तो वह भी कर सकते हैं।
रोबोटिक आर्म से कम गहराई तक लगता है कट
डॉ अश्वनी मैचंद ने बताया कि मौजूदा ट्रेडिशनल तरीके की तुलना में रोबोटिक टेक्नोलॉजी के उपयोग से रोबोटिक आर्म के जरिए कम गहराई तक घुटने पर कट किया जाता है। इससे कम चीरफाड़ की जरूरत होती है, मरीज का कम ब्लड निकलता है और उनको दर्द भी कम होता है। इसमें 6 इंच तक की ही गहराई तक कट लगता है। जबकि मौजूदा परंपरागत तरीके से घुटने के ऊपर की मांसपेशियों को हटाकर, घुटने के चारों तरफ को मैनुअल तरीके से काटने की आवश्यकता पड़ती है। परंपरागत प्रक्रिया के तहत 14 इंच तक भी कट लगाने की जरूरत पड़ती है। उन्होंने बताया कि हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी में भी जल्द ही रोबोटिक टेक्नोलॉजी को शुरू करने की तैयारी की जा रही है। वहीं, डॉ अश्वनी मैचंद ने इस सर्जरी की कॉस्ट पर कहा कि हमारा फोकस मरीज को बेहतर इलाज देने पर है, कॉस्ट पर नहीं है। हालांकि, इस तरह की सर्जरी की कॉस्ट 2 लाख से 5 लाख रुपए के बीच में आएगी। इसमें मरीज को ट्रेडिशनल तरीके की तुलना में ज्यादा समय तक घुटने से जुड़ी समस्या को लेकर परेशानी नहीं होगी। अभी ट्रेडिशनल तौर पर नी रिप्लेसमेंट सर्जरी की लाइफ 15 से 20 साल तक है। लेकिन हमें उम्मीद है कि एमआईएस तकनीक आधारित सर्जरी के आने वाले समय में और भी बेहतर रिजल्ट आएंगे और रोबोटिक टेक्नोलॉजी सर्जरी की लाइफ, इससे भी लंबे समय तक होगी।
यूजर फ्रेंडली है तकनीक
डॉ अश्वनी मैचंद ने बताया कि पारंपरिक प्रक्रिया की तुलना में फुली एक्टिव रोबोट नी रिप्लेसमेंट सर्जरी के क्षेत्र में यह बहुत फायदेमंद है। हम भारत में पहली बार एमआईएस तकनीक को रोबोटिक्स टेक्नॉलॉजी के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं। यह तकनीक यूजर-फ्रेंडली और फ्लैक्सिबल है और सुरक्षा के साथ सटीकता प्रदान करती है। यह मॉडर्न टेक्नॉलॉजी मरीजों को बेहतरीन रिजल्ट भी देती है। इसमें संक्रमण का जोखिम बहुत कम है और मरीज कम दर्द के साथ बहुत तेजी से हेल्थ बेनेफिट्स प्राप्त करता है। मरीज सर्जरी के कुछ ही घंटों में चलने-फिरने में समर्थ हो जाते हैं। यह जोड़ों की समस्याओं वाले मरीजों के लिए स्थायी समाधान है।
एक महीने में 20 मरीज की हो चुकी है सर्जरी
डॉ अश्वनी मैचंद ने बताया कि एक महीने पहले ही इस सर्जरी की शुरुआत अस्पताल में की गई है। अभी तक 20 मरीज की सर्जरी एक महीने में की जा चुकी है। साथ ही उन्होंने पत्रिका के रोबोटिक टेक्नोलॉजी के लिए डॉक्टरों के प्रशिक्षण देने से जुड़े सवाल पर बताया कि इसमें जागरूकता की जरूरत है। लेकिन अभी एमबीबीएस, ऑर्थोपेडिक व ओंकोलॉजी में रोबोटिक तकनीक के अनुरूप डॉक्टर प्रशिक्षित हो रहे हैं। इसके अलावा डॉक्टर कंप्यूटर लिटरेसी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तहत भी पहले से ही ट्रेनिंग लेकर अस्पतालों में आ रहे हैं। जिसके बाद उन्हें रोबोटिक टेक्नोलॉजी के मद्देनजर सर्जरी के की ट्रेनिंग देना भी अच्छी तरह से सुनिश्चित किया जा रहा है। हम अपने अस्पताल में भी ग्रेजुएट होने वाले युवा डॉक्टरों के लिए एक से तीन महीने का रोबोटिक टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को लेकर फैलोशिप प्रोग्राम का भी संचालन कर रहे हैं।
मरीजों को मिलेगा बेहतर केयर व स्टीक परिणाम
वहीं, अस्पताल के चीफ बिजनेस ऑफिसर विपुल जैन ने दावा करते हुए कहा कि हमें भारत में सबसे पहले नी रिप्लेसमेंट के लिए रोबोटिक टेक्नॉलॉजी प्रस्तुत करने की खुशी है। यह अपने मरीजों के लिए आधुनिक मेडिकल इनोवेशन और तकनीकों का इस्तेमाल कर हेल्थकेयर के ग्लोबल स्टैंडर्ड प्रदान करने का लक्ष्य हासिल करने की हमारी प्रतिबद्धता का प्रमाण है। पिछले कुछ सालों में, भारत में ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी कराने वाले लोगों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। हमने बेहतर निदान और सटीक परिणामों द्वारा अपने मरीजों को बेहतर केयर देने के लिए यह अल्ट्रा मॉडर्न और मिनिमली इनवैसिव टेक्नॉलॉजी लॉन्च की है।