27 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

न दस्तावेज, न ब्याज, माथे पर तिलक लगा आदिवासी समाज देता ‘लोन’

अनूठी देशज परंपरा: दक्षिणी राजस्थान की 'नोतरा' प्रथा में जनजाति समाज करता परस्पर मदद

2 min read
Google source verification

बांसवाड़ा . जहां आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था में कर्ज लेने के लिए दस्तावेज, गारंटी और ब्याज का जाल फैला है, वहीं दक्षिणी राजस्थान और मध्यप्रदेश-गुजरात के सीमावर्ती इलाकों के आदिवासी अंचलों में परस्पर सहयोग की एक ऐसी सामाजिक परंपरा जीवित है, जो पूरी तरह विश्वास और भागीदारी पर टिकी है। राजस्थान के उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ के आदिवासी समुदाय की यह 'नोतरा' परंपरा है जिसमें किसी भी आदिवासी परिवार में शादी आदि आयोजन या अन्य आवश्यकता को सामुदायिक सहयोग से पूरा किया जाता है। यह नोतरा परंपरा किसी सहयोग बैंक से कम नहीं।-----पंच संभालते हैं जिम्मा, रखा जाता है हिसाबनोतरा का शाब्दिक अर्थ निमंत्रण है। इस अनूठी परंपरा के तहत किसी भी आदिवासी परिवार का मुखिया अपने यहां होने वाले आयोजन या आवश्यकता के लिए गांव के पंचों को नोतरा का प्रस्ताव देता है। पंच इस खास परिवार में नोतरा की तिथि का निर्धारण ताकि किसी दूसरे परिवार का कार्यक्रम, नोतरा आदि की तिथि का टकराव न हो। नोतरे की तिथि पर गांव का हर परिवार संबंधित व्यक्ति के घर भोजने के लिए जाता है और मुखिया को तिलक लगाकर अपने सामर्थ्य के अनुसार नकद राशि या अन्य वस्तु सहयोग के रूप में देता है। गांव के वरिष्ठ एवं शिक्षित व्यक्ति के पास यह राशि व उसका हिसाब जमा रहता है। संबंधित परिवार के मुखिया को आयोजन के दिन अथवा दूसरे दिन पूरी राशि सौंप दी जाती है। ग्रामीणों के अनुसार नोतरे से परिवार को हजारों-लाखों रुपए तक की मदद मिलती है।

निमंत्रण का तरीका बताता है नोतरा क्यों

नोतरा से शादी-ब्याह, बीमारी, मकान निर्माण जैसे कार्यों में आर्थिक सहायता मिलती है। ग्रामीण बताते हैं कि अलग-अलग आयोजन में निमंत्रण का तरीका अलग-अलग होता है। शादी या अन्य मांगलिक कार्यक्रम में निमंत्रण पत्र या पीले चावल दिए जाते हैं। यदि अन्य किसी कार्य से नोतरा किया जा रहा है तो कुंकुंम चावल दिए जाते हैं। मृत्यु भोज के लिए नोतरा नहीं हो सकता।

छोटे-बड़े का भेद नहीं, नोतरा जरूरी

समाज में गरीब-अमीर, छोटे-बड़े के भेदभाव के बिना नोतरा करना सभी के लिए आवश्यक है। नोतरा का लेखा जोखा गांव का शिक्षित व्यक्ति रखता है। अलग-अलग परिवारों में नोतरा के आयोजन पर अन्य परिवार पिछली बार उनके यहां नोतरा में दी गई रकम को बढ़ाकर संबंधित परिवार को सहयोग देता है। इससे कुल मिलाकर नोतरे की रकम बढ़ती रहती है।---------

मदद के साथ सामाजिक बंधन मजबूत

'नोतरा प्रथा बहुत उपयोगी है। किसी भी आयोजन में गांव-समाज की भागीदारी से मदद भी मिलती है और सामाजिक बंधन भी मजबूत होता है। आदिवासी परिवार के लिए कोई भी आयोजन आर्थिक बोझ नहीं बनता।' - लालसिंह मईड़ा, स्कूल व्याख्याता, कुशलगढ़