
Patrika Interview: एक्सपर्ट से जानिए, कब होगी कोरोना पर जीत?
डॉ. लहारिया देश के जाने-माने स्वास्थ्य और महामारी विशेषज्ञ हैं। इन्होंने भारत की राष्ट्रीय टीका नीति तैयार करने में अहम भूमिका निभाई है। कोरोना से भारत की जंग पर किताब आ रही है- ‘Till We Win: India’s fight against Covid-19 pandemic’। इस किताब को डॉ. लहारिया, एम्स दिल्ली के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया और टीकों की एक्सपर्ट डॉ. गगनदीप कांग ने मिल कर लिखा है।
प्रश्न- कोरोना पर अपकी किताब का शीर्षक ही है ‘टिल वी विन...’ तो यह जीत हासिल कब होगी?
यह नाम उम्मीद की किरण दिखाने वाला है। संघर्ष के दो हिस्से हैं। महामारी से जीत की प्रक्रिया टीका आने के चार-छह महीने में शुरू हो जाएगी। यह वैश्विक संघर्ष है और उसी स्तर पर जीतना होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) आकलन के आधार पर घोषणा करेगा कि अब हम वैश्विक महामारी के स्तर से नीचे आ गए हैं। संभवतः अगले साल के अंत तक ऐसा हो पाए। जब लोगों से सीधे संपर्क में रह कर सेवा देने वाले और ज्यादा रिस्क वाले लोगों को टीका मिल जाए।
दूसरा हिस्सा है कोरोना वायरस से जीत। लग रहा है कि इनफ्लूएंजा वायरस की ही तरह कोरोना के साथ भी हमें जीना सीखना होगा।
प्रश्न- सरकारी वैज्ञानिकों ने नेशनल कोविड सुपरमॉडल के आधार पर कहा है कि पीक आ कर गया।
रिपोर्ट तब तक की सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित थी। परिस्थितियां लगातार बदलती रहती हैं। ऐसा कोई भी मॉडलिंग आधारित अध्ययन सिर्फ दिशा बताता है, पक्का ठिकाना नहीं। वैज्ञानिक ऐसे अध्ययन निरंतर करते रहें और नीति निर्धारत उस आधार पर फैसला लेते रहें।
कुछ राज्यों में दूसरा पीक आ रहा है, अमेरिका में तीसरा चल रहा है। ऐसे में दूसरे-तीसरे पीक के लिए भी तो तैयार रहना होगा।
प्रश्न- हमारे लिए कौन सा टीका सटीक?
फायजर और मोडेरना के टीकों का प्रभाव बहुत। लेकिन इनकी उत्पादन क्षमता सीमित है, कीमत बहुत अधिक है, इन्होंने एडवांस सौदे कर लिए हैं और इन्हें बहुत कम तापमान पर रखने की चुनौती है।
ऑक्सफोर्ड के टीके का प्रभाव भी काफी अच्छा। यह हमारी मौजूदा टीका वितरण व्यवस्था में आसानी से फिट भी।
प्रश्न- आइसीएमआर (ICMR) प्लाज्मा थेरेपी के प्रभाव को नकार चुका, मगर सरकारें अपील कर रहीं? शोध में एचसीक्यू (HCQ) का कोई असर नहीं, लेकिन हमारे यहां इलाज इसी से हो रहा?
सरकार इलाज की एक मानक व्यवस्था देती है, लेकिन ऐसी बदलती परिस्थिति में हर मामले में उसे अपनाया नहीं जाता।
शुरुआत में चीन और फ्रांस में हुए अध्ययन में पाया गया कि जो मरीज पहले से एचसीक्यू का दूसरी बीमारी के इलाज के लिए सेवन कर रहे थे, उनमें मृत्यु कम हो रही है। लेकिन जब बड़े स्तर पर डब्लूएचओ का अध्ययन हुआ तो इसका प्रभाव साबित नहीं हुआ। मगर यह अध्ययन मृत्यु रोकने के लिहाज से किया गया। जबकि बीमारी की अवधि घटाने जैसे कई और कारकों का भी ध्यान रखना होता है।
इसी तरह प्लाज्मा थेरेपी के अध्ययन के बाद इसकी भागमभाग घटेगी। लेकिन सही डोनर चुन कर, मरीज के शरीर में एंटीबॉडी की स्थिति का आकलन कर और बीमारी की सही अवस्था में इसे दिया जा रहा है तो गलत नहीं कहा जा सकता।
प्रश्न- क्या फैसले लोक स्वास्थ्य और महामारी विशेषज्ञों की बजाय अफसरों ने लिए?
यह तितरफा साझेदारी है। तकनीकी विशेषज्ञ आकलन करें और विकल्प दें, नीति निर्माता फैसले लें और समुदाय उसे अमल में लाए। यह सच है कि कोरोना से निपटने के मामले में इस संतुलन में उतार-चढ़ाव आते रहे।
Published on:
04 Dec 2020 02:28 pm
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