
Pakistani Hindu: भारत में रह रहे पाकिस्तानी हिंदुओं को देश के सर्वोच्च न्यायालय का साथ मिला है। दरअसल, सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा है कि अगर आपने पाकिस्तान से आए हिंदुओं को नागरिता दी है तो अभी तक उनको आवास मुहैया क्यों नहीं कराया। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की जब मजनू का टीला इलाके में झुग्गियों में रहने वाले लोगों को वहां से हटाने की तैयारी की जा रही थी।
बताया जा रहा है कि ये परिवार वर्षों पहले पाकिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न का सामना करने के बाद भारत आए थे। इनमें से अधिकांश अनुसूचित जाति से जुड़े हिंदू हैं, जो आज दिल्ली के यमुना फ्लडप्लेन क्षेत्र में झुग्गी-झोपड़ियों में रहकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इनमें कई लोगों को भारत की नागरिकता मिल चुकी है, जबकि कुछ के मामले अभी आवेदन और सत्यापन की प्रक्रिया में हैं। इस बीच दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (डीडीए) और अन्य संबंधित एजेंसियों ने यमुना फ्लडप्लेन पर अवैध अतिक्रमण का हवाला देते हुए इन्हें हटाने की तैयारी शुरू कर दी थी। मई 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई को लेकर फैसला सुनाते हुए एजेंसियों को अतिक्रमण हटाने की अनुमति दे दी थी। हालांकि, अपने पुनर्वास और मानवीय अधिकारों का हवाला देते हुए प्रभावित परिवारों ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जहां अब मामले की सुनवाई की उम्मीद की जा रही है।
आपको बता दें कि इस मामले की सुनवाई जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल नागरिकता देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इन लोगों को सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जीने के लिए बुनियादी सुविधाओं वाली सुरक्षित आवास व्यवस्था भी उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि जिन लोगों ने धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए अपना देश छोड़ा और भारत को अपना घर माना, उन्हें इस तरह बेघर होने के हालात में नहीं छोड़ा जा सकता। यह टिप्पणी उस समय आई है, जब दिल्ली के मजनू का टीला इलाके में सिग्नेचर ब्रिज के पास बसे इन शरणार्थियों के कैंप पर विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि विकास परियोजनाओं या अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान मानवीय पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और सरकार को पुनर्वास के ठोस और संवेदनशील विकल्पों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (डीडीए) को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने अगली सुनवाई तक इन शरणार्थियों को हटाने या उनके कैंप को खाली कराने से जुड़ी किसी भी कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन और गरिमा का अधिकार केवल नागरिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सिर पर छत, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन की मूलभूत शर्तें भी शामिल हैं। कोर्ट ने सरकार से यह भी सवाल किया कि जब इन लोगों को भारतीय नागरिकता दी जा चुकी है या देने की प्रक्रिया चल रही है, तो अब तक इनके लिए वैकल्पिक आवास या उचित पुनर्वास की व्यवस्था क्यों नहीं की गई। अदालत ने संकेत दिया कि इस मामले में प्रशासनिक सुविधा से ज्यादा मानवीय और संवैधानिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
Updated on:
03 Feb 2026 02:03 pm
Published on:
03 Feb 2026 02:02 pm

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