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यूपी में महीनों पहले चुनावी बिसात बिछनी शुरू

देश के सबसे बड़े सियासी राज्य उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अभी कई महीने बाकी हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी चुनावी जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हालिया भाषणों और सरकारी कार्यक्रमों में हिंदुत्व, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, धार्मिक पर्यटन और कानून-व्यवस्था के मुद्दे प्रमुखता से उभर रहे हैं। वहीं समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव लगातार पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे को धार देने में जुटे हैं। कांग्रेस भी जातीय जनगणना, सामाजिक न्याय और रोजगार के मुद्दों पर भाजपा को घेर रही है। हालांकि भाजपा के मुकाबले सपा व कांग्रेस का तालमेल जमीन पर नहीं दिख रहा है।

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नई दिल्ली। देश के सबसे बड़े सियासी राज्य उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अभी कई महीने बाकी हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी चुनावी जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हालिया भाषणों और सरकारी कार्यक्रमों में हिंदुत्व, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, धार्मिक पर्यटन और कानून-व्यवस्था के मुद्दे प्रमुखता से उभर रहे हैं। वहीं समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव लगातार पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे को धार देने में जुटे हैं। कांग्रेस भी जातीय जनगणना, सामाजिक न्याय और रोजगार के मुद्दों पर भाजपा को घेर रही है। हालांकि भाजपा के मुकाबले सपा व कांग्रेस का तालमेल जमीन पर नहीं दिख रहा है।

योगी के तेवरों में दिख रही चुनावी तैयारी

पिछले कुछ महीनों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई मंचों से कानून-व्यवस्था, माफिया विरोधी कार्रवाई और सांस्कृतिक पहचान के मुद्दों को जोरदार ढंग से उठाया है। कांवड़ यात्रा, धार्मिक स्थलों के विकास, अयोध्या, काशी और मथुरा जैसे प्रतीकात्मक मुद्दे भाजपा के राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं। इसके साथ ही सडक़ पर नमाज, गाय को राष्ट्रीय पशु दर्जा देने की मांग पर कड़े तेवर दिखाकर योगी ने अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं।

भाजपा के लिए चुनौती: लोकसभा चुनाव 2024 में

अपेक्षा से कम सीटें मिलने के बाद अब भाजपा को अच्छे प्रदर्शन दोहराने की चुनौती है। पार्टी के लिए महंगाई, बेरोजगारी, किसान, यूजीसी, नीट पेपर लीक, सीबीएससी जैसे मुद्दों की काट तलाशना चुनौती भरा है।

अखिलेश का दांव: पीडीए

लोकसभा चुनाव के बाद से अखिलेश यादव लगातार पीडीए फार्मूले को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका दावा है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। हाल के भाषणों में उन्होंने भाजपा पर पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों की उपेक्षा का आरोप लगाया है। सपा का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले समर्थन ने यह संकेत दिया कि यदि इन वर्गों की राजनीतिक एकजुटता बनी रहती है तो विधानसभा चुनाव में भाजपा को कड़ी चुनौती दी जा सकती है।

सपा के लिए चुनौती: भाजपा से मुकाबले से पहले

अपने सहयोगी कांग्रेस से तालमेल बिठाना जरूरी होगा। गठबंधन को लेकर दोनों ही ओर से अब तक स्पष्टता नहीं आई है। पार्टी के सांसद, पदाधिकारी मनमाने तरीके से सीट बंटवारे पर बयान देकर दोनों दलों के बीच दूरियां बढ़ा रहे हैं।

कांग्रेस की जद्दोजहद वोट बढ़ाने की

कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी नेतृत्व जातीय जनगणना, संविधान, आरक्षण और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर लगातार हमलावर है। पार्टी इस बार ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लडऩे की कोशिश में है। हालांकि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी साथ लड़ेंगी या नहीं, इस पर अभी कोई स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आई है। वहीं पार्टी के बड़े नेता दावा कर चुके हैं कि उनका संगठन हर जिले तक खड़ा हो चुका है।

मायावती नहीं खोल रही पत्ते

बसपा के बिना यूपी की सियासत अधूरी है। लगातार जनाधार सिमटने के बावजूद बसपा और उसकी प्रमुख मायावती की अहमियत बरकरार है। यही वजह है कि कांग्रेस पर्दे के पीछे से इस कोशिश में लगी है कि कांग्रेस, सपा और बसपा साथ मिलकर चुनाव लड़े, जिससे दलित, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के वोटों का विभाजन रुक जाए। हालांकि मायावती ने अब तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं।

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