
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में लड़ाई अब सिर्फ भाजपा और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच नहीं रह गई है। "भाजपा का लक्ष्य राज्य में अपना वोट शेयर 50 फीसदी से ऊपर ले जाना है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि इसके लिए पार्टी केवल संगठन विस्तार ही नहीं, बल्कि विपक्ष के बदलते समीकरणों को भी अपने पक्ष में अवसर के रूप में देख रही है। यह ठीक वैसे ही, जैसे पिछले एक दशक में उत्तर-पूर्व के कई राज्यों में हुआ, जहां विपक्ष धीरे-धीरे सिमटता गया और सत्ता के खिलाफ मजबूत विकल्प लगभग खत्म हो गया। बंगाल में इसी तरह की तस्वीर बनने लगी है।
दरअसल, करीब डेढ़ महीने पहले सत्ता से बाहर होते ही टीएमसी अपने अस्तित्व बचाने के संघर्ष से जूझने लगी। जहां पहले ऋतव्रत बनर्जी की अगुवाई में 65 विधायकों ने अलग होकर खुद को असली टीएमसी का दावा ठोक दिया, वहीं 20 सांसदों ने एक गुमनाम पार्टी में जाने की घोषणा कर दी। ऐसे में ममता के साथ नाम के विधायक और सांसद रह गए। टीएमसी की लड़ाई भाजपा से ज्यादा आपस में हो रही है। जहां चुनाव आयोग तक पहुंच कर असली टीएमसी होने का दावा किया जा रहा है। इस बीच भाजपा ने शुरुआती दिनों में आराम से विपक्ष के बिना किसी विरोध के अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे को आगे बड़ा दिया।
टीएमसी में पैदा हुए नए राजनीतिक हालात को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा भाजपा की भूमिका को लेकर है। ममता बनर्जी लगातार आरोप लगा रही हैं कि पार्टी में विभाजन स्वाभाविक नहीं, बल्कि सुनियोजित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। भाजपा इन आरोपों को सिरे से खारिज करती है। हालांकि राजनीतिक गलियारों में यह बहस लगातार जारी है कि क्या बंगाल में वही प्रयोग दोहराया जा रहा है, जिसने उत्तर-पूर्व के कई राज्यों में विपक्ष की राजनीति का स्वरूप बदल दिया था।
ममता से अलग हुए 20 सांसद तो एनडीए के साथ चले गए। जबकि 65 विधायक खुद को असली विपक्ष बता रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि दोनों की राजनीतिक दिशा अलग है तो ममता विरोध की यह राजनीति आगे किस रूप में सामने आएगी? नेता प्रतिपक्ष ऋतव्रत बनर्जी ने ‘पत्रिका’ से कहा कि असली विपक्ष वो ही है। टीएमसी खत्म नहीं हुई है। एसआइआर जैसे मुद्दे हमारे लिए अहम बने हुए हैं। एनडीए के साथ गए सांसदों के उनके साथ होने के सवाल पर वो चुप्पी साध गए।
भाजपा के लिए बंगाल की लड़ाई केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं है। यदि पार्टी अपना वोट आधार 50 प्रतिशत से ऊपर ले जाने में सफल होती है और विपक्ष लंबे समय तक बंटा रहता है, तो राज्य की राजनीति का ढांचा भी उत्तर-पूर्व की तरह बदल सकता है। यही वजह है कि 2026 का चुनाव सरकार बदलने से कहीं बड़ा राजनीतिक प्रयोग माना जा रहा है।
1. नगालैंड: 60 सदस्यीय विधानसभा में पूरा सदन सत्तापक्ष के साथ, विपक्ष में कोई नहीं
2. सिक्किम: 32 सदस्यीय विधानसभा में विपक्ष में कोई नहीं
3. अरुणाचल प्रदेश:60 सदस्यीय विधानसभा में विपक्ष नाम का
4.असम: 126 सदस्यीय वाली विधानसभा में विपक्ष के पास सिर्फ 19 विधायक
5. मेघालय: 60 सदस्यीय विधानसभा में विपक्ष में सिर्फ 9 विधायक
6. मणिपुर: 60 सदस्यीय विधानसभा में विपक्ष में सिर्फ 7 विधायक
Updated on:
08 Jul 2026 11:36 am
Published on:
08 Jul 2026 11:36 am
