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350 साल पुरानी विरासत पर संकट: राजसमंद झील की पाल जर्जर, बढ़ा खतरा, मिट्टी के बांध को अंदर से खोखला कर दिया

राजसमंद. मेवाड़ की आन-बान और संगमरमर नगरी की पहचान राजसमंद झील आज गंभीर संकट से जूझ रही है। सत्रहवीं शताब्दी में निर्मित यह ऐतिहासिक जलधरोहर अब जर्जर होती संरचना के कारण अपने अस्तित्व पर खतरे का सामना कर रही है। राजसमंद झील संरक्षण अभियान के समन्वयक दिनेश श्रीमाली ने केंद्र और राज्य सरकार को पत्र […]

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Rajsamamand Jheel

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राजसमंद. मेवाड़ की आन-बान और संगमरमर नगरी की पहचान राजसमंद झील आज गंभीर संकट से जूझ रही है। सत्रहवीं शताब्दी में निर्मित यह ऐतिहासिक जलधरोहर अब जर्जर होती संरचना के कारण अपने अस्तित्व पर खतरे का सामना कर रही है। राजसमंद झील संरक्षण अभियान के समन्वयक दिनेश श्रीमाली ने केंद्र और राज्य सरकार को पत्र लिखकर झील के तत्काल जीर्णोद्धार की मांग की है। उनका कहना है कि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह अमूल्य धरोहर भारी क्षति झेल सकती है।

पाल कमजोर, बढ़ता खतरा

झील के मुख्य सेतु नौचौकी (लगभग 581 गज लंबा) सहित करीब सवा किलोमीटर लंबी पाल में कई स्थानों पर दरारें और धंसाव देखने को मिल रहे हैं। चूहों द्वारा बनाए गए बिलों ने मिट्टी के बांध को अंदर से खोखला कर दिया है। हालांकि नौचौकी क्षेत्र में पुरातत्व विभाग द्वारा कुछ मरम्मत कार्य किए गए हैं, लेकिन झील की कच्ची पाल जो इसकी असली सुरक्षा है अब भी उपेक्षित है।

पांच सेतुओं में बंटी झील, सभी पर संकट

राजसमंद झील की संरचना पांच प्रमुख सेतुओं में विभाजित है—

  • नौचौकी सेतु
  • बिंब सेतु
  • कांकरोली सेतु
  • आसोटिया सेतु
  • वांसोल सेतु

विशेषज्ञों के अनुसार, कांकरोली, आसोटिया और वांसोल सेतुओं की पाल तेजी से जर्जर हो रही है। किसी भी बांध या एनीकट के लिए नियमित तकनीकी मरम्मत आवश्यक होती है, लेकिन आज़ादी के बाद इस दिशा में ठोस योजना का अभाव रहा है।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

  • झील का निर्माण वर्ष 1676 में महाराणा राज सिंह द्वारा कराया गया था।
  • इसका उद्देश्य अकाल के समय लोगों को रोजगार देना था।
  • नौचौकी घाट भारतीय प्रस्तर कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।

झील तट पर स्थित द्वारकाधीश मंदिर पुष्टिमार्ग की प्रमुख पीठों में से एक है, जहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।

ऐतिहासिक जल प्रबंधन का अनूठा उदाहरण

राजसमंद झील राजस्थान की प्रमुख कृत्रिम झीलों में शामिल है। यह जल प्रबंधन, स्थापत्य और सामाजिक कल्याण का उत्कृष्ट नमूना रही है। झील की पाल पर लगी संगमरमर की शिलालेख पट्टिकाएं मेवाड़ के इतिहास को संजोए हुए हैं।

अनदेखी और राजनीति बनी बाधा

पिछले चार दशकों में झील के संरक्षण को लेकर कई घोषणाएं और राजनीतिक वादे हुए, लेकिन जमीनी स्तर पर ठोस कार्य नहीं हो पाया। नतीजतन यह ऐतिहासिक धरोहर उपेक्षा का शिकार हो गई है।

अब जरूरी है त्वरित कार्रवाई

कंवर बुर्ज से सलूस मार्ग तक का बंध अब खतरे की स्थिति में है। हाल ही में कुछ स्थानों पर पाल धंसने की घटनाएं सामने आई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि विस्तृत सर्वे और वैज्ञानिक तरीके से पुनर्निर्माण ही इस झील को बचा सकता है।