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सरकारी पैसों की बर्बादी का नमूना: पहले 5.55 लाख में खरीदे ई रिक्शा, अब मरम्मत पर खर्च कर रहे ढाई लाख

शहर के बीचोंबीच खड़ी पांच ई-रिक्शाओं की कहानी अब केवल जंग लगे वाहनों की कहानी नहीं रह गई थी, बल्कि यह सरकारी योजनाओं की अधूरी प्लानिंग, लापरवाही और जवाबदेही की कमी की मिसाल बन गई है।

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E-Riksha News

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राजसमंद. शहर के बीचोंबीच खड़ी पांच ई-रिक्शाओं की कहानी अब केवल जंग लगे वाहनों की कहानी नहीं रह गई थी, बल्कि यह सरकारी योजनाओं की अधूरी प्लानिंग, लापरवाही और जवाबदेही की कमी की मिसाल बन गई है। करीब 5 लाख 55 हजार रुपए खर्च कर खरीदे गए ये ई-रिक्शा कभी महिलाओं की सुविधा और सुरक्षा का सपना बनकर शहर में उतारे गए थे, लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि इन्हें फिर से सड़क पर उतारने के लिए करीब प्रत्येक ई रिक्शा पर 50 हजार रुपए और खर्च करने की तैयारी की जा रही है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जिन ई-रिक्शाओं को महिलाओं के सुगम और सुरक्षित आवागमन के लिए खरीदा गया था, उनकी लंबे समय तक सुध नहीं ली गई। पड़े-पड़े ई रिक्शा खराब हो गए और अब फिर से सरकारी खजाने से करीब ढाई लाख रूपए की राशि इनको सुधारने पर खर्च की जा रही है।

उद्घाटन हुआ, सपना टूटा और पहिए थम गए

5 अक्टूबर 2018 को तत्कालीन उच्च शिक्षा मंत्री किरण माहेश्वरी ने इस योजना का उद्घाटन किया था। योजना का उद्देश्य था कि शहर की महिलाओं, विशेषकर जिला चिकित्सालय आने-जाने वाली महिलाओं को नि:शुल्क या आधे किराए में सुविधा मिल सके। इसके लिए प्रत्येक ई-रिक्शा करीब 1 लाख 11 हजार रुपए में खरीदा गया। लेकिन उद्घाटन के दिन ही एक ई-रिक्शा आवरी माता मंदिर के पास पलट गया और उसका कांच टूट गया। इसके बाद जैसे पूरी योजना का पहिया ही रुक गया। सभी ई-रिक्शा एक साथ खड़े करवा दिए गए और फिर कभी सड़क पर नहीं उतर सके।

‘महिला सशक्तिकरण’ केवल भाषणों तक सीमित रहा

योजना में यह भी तय किया था कि इन ई-रिक्शाओं को महिला चालक चलाएंगी। शहर के मुख्य मार्गों, बाजार और जिला अस्पताल तक संचालन का प्रस्ताव था। किराया भी सामान्य से आधा रखने की घोषणा की गई थी। लेकिन धरातल पर तस्वीर बिल्कुल उलट रही। न महिला ड्राइवर नियुक्त हुईं, न संचालन रूट तय हुए,न किराया नीति बनी,न चार्जिंग स्टेशन तैयार किए गए,और न ही मेंटेनेंस की कोई व्यवस्था बनाई गई। परिणाम यह हुआ कि ये ई-रिक्शा कबाड़ में तब्दील होने लगे।

अब मरम्मत पर फिर खर्च, खड़े हुए गंभीर सवाल

सालों तक उपेक्षा झेलने के बाद अब नगरपरिषद ने इन ई-रिक्शाओं की सुध ली है। जानकारी के अनुसार, इन्हें फिर से चालू हालत में लाने के लिए करीब 90 हजार रुपए खर्च किए जाएंगे। यानी पहले खरीद पर लाखों खर्च हुए और अब खराब हो चुके वाहनों को सुधारने पर अलग से सरकारी राशि खर्च होगी। इस पूरे मामले ने सरकारी धन के उपयोग और योजनाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बिना प्लानिंग की योजना का नतीजा

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुरुआत से ही संचालन, रखरखाव और तकनीकी व्यवस्था की स्पष्ट योजना बनाई जाती, तो ये ई-रिक्शा शहर में महिलाओं के लिए उपयोगी साबित हो सकते थे। लेकिन बिना तैयारी के खरीद की गई योजना अब नगरपरिषद के लिए सिरदर्द बन गई है। नगरपरिषद सूत्रों के अनुसार, वर्षों से इस विषय पर चर्चाएं तो हुईं, लेकिन किसी स्तर पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया। अब हालत यह है कि ई-रिक्शा जर्जर हो चुके हैं और उनकी मरम्मत लागत भी मूल कीमत के करीब पहुंचने लगी है।

जनता पूछ रही है जवाब

शहरवासियों के बीच अब यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इस नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या जनता के पैसों से खरीदी गई इस परियोजना का कोई हिसाब तय होगा, या फिर यह योजना भी सरकारी फाइलों में बंद होकर धूल खाती रह जाएगी?

इनका कहना है

ई रिक्शा के संबंध में मुझे कोई जानकारी नहीं है। पता करवाना पड़ेगा।

ललितसिंह देथा, आयुक्त, नगर परिषद, राजसमंद