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एक साल 67 गर्भवती की टूटी सांसों की डोर, कारण अंचलों में नहीं है महिला डॉक्टर

-एसआरएस सर्वे रिपोर्ट जारी, मप्र में बढ़ी एमएमआर की दर, एक लाख में १७३ की जगह १७५ हो रही मौतें -गांवों में पुरुष चिकित्सकों से जांच कराने कतरा रही प्रसूताएं

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दमोह

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Aakash Tiwari

May 16, 2025

आकाश तिवारी
दमोह. प्रशासन द्वारा किए जा रहे तमाम प्रयासों के बाद भी मातृ मृत्युदर पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। बुंदेलखंड के पांच जिलों में फिलहाल सबसे बुरी स्थिति पर दमोह जिला है। अप्रेल २०२४ से मार्च २०२५ के आंकड़ों पर नजर डालें तो ६७ प्रसूताओं की मौत हो चुकी हैं। इन मौतों के पीछे की सबसे बड़ी वजह अंचलों में महिला चिकित्सकों का न होना माना जा रहा है।
दशकों से यह स्थिति बनी हुई है। परेशानी की बात यह है कि गांवों में आज भी महिलाएं पुरुषों के पास जाकर जांच कराने में हिचकती हैं। इस वजह से समय पर जांचे नहीं हो पाती।
-३०० की भीड़ में कैसे हो हाइरिस्क प्रसूताओं की जांच,
जिले में वर्ष २०१६ से प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत शिवरों के आयोजन हो रहे हैं। महीने में ९ व २५ तारीख को शिविर लगाए जाते हैं। हैरानी की बात यह है कि इन शिवरों में सभी प्रकार की प्रसूताओं को बुलाया जा रहा है। जबकि हाइ रिस्क प्रसूताओं को पहले प्राथमिकता दी जाना चाहिए। भीड़ अधिक होने से हाइरिस्क प्रसूताओं का परीक्षण सही ढंग से नहीं हो पा रहा है। यह स्थिति तब है जब जिले में शिविरों के आयोजन पर प्रशासन नजर रखे हुए हैं। बताया जाता है कि प्रत्येक ब्लॉक में शिविरों के दौरान ३०० से अधिक प्रसूताओं को बुलाया जा रहा है।
-शुगर की जांच को किया जा रहा अनदेखा..
विशेषज्ञ बताते हैं कि गर्भवती महिलाओं के शुगर की जांच अनिवार्य है। ओरल ग्लूकोज टॉलरेंट टेस्ट के जरिए गर्भवती को ५०० एमएल पानी में ग्लोकोज दिया जाता है। दो घंटे तक उसे बैठाकर रखते हैं। इसके बाद उसकी जांच की जाती है। यदि उसका वेल्यू १४० से अधिक होती है तो वह प्रसूता शुगर की श्रेणी में आती है। पर देखा जा रहा है कि इस प्रक्रिया को कहीं भी फॉलो नहीं किया जा रहा है।
-रिपोर्ट: १७३ की जगह १७५ हो गई एमएमआर की दर
जानकारी के मुताबिक हालही में शासन ने एसआरएस सर्वे २०२१-२२ रिलीज किया है। इसमें मप्र में एमएमआर की दर बढ़ रही है। अभी तक एक लाख प्रसव में १७३ मौतें होती थीं। अब बढ़कर १७५ हो गई है। वहीं, जिले की सर्वे रिपोर्ट अभी नहीं आई है।
महिला चिकित्सक न होने के नुकसान
-गांव में पुरुष चिकित्सक से नहीं कराती प्रसूताएं जांच।
-जांच न होने से गर्भ में पल रहे बच्चे और महिला में आ रही जटिलता की नहीं हो पा रही पहचान।
-हाइ रिस्क होने के बाद जब प्रसव के लिए आती हैं तब बिगड़ जाती है स्थिति।
-जमीनी अमला भी ईमानदारी से नहीं दे रहा ध्यान।
-पीएमएसएमए का भी क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा सही ढंग से।

वर्शन
महिला चिकित्सकों की अंचलों में भारी कमी है। यह सिर्फ दमोह जिले में नहीं है बल्कि मप्र में है। हमारे स्तर से शासन को पत्र लिखे गए हैं। मातृ मृत्युदर पर अंकुश लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

डॉ. मुकेश जैन, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी