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भारत में कितने लोग ‘सरकारी मकान’ में रहते हैं? सरकारी क्वार्टर, रेलवे कॉलोनी और खाली पड़े आवासों की स्थिति

Government Housing in India : जानिए भारत में सरकारी आवासों की स्थिति क्या है, GPRA और रेलवे कॉलोनियों में कितने मकान हैं, और देश भर में हजारों सरकारी मकान खाली क्यों पड़े हैं।
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Government Housing in India

Government Housing in India : देश में कितने लोगों के पास सरकारी आवास।

भारत में सरकारी नौकरी को लेकर सबसे बड़ा आकर्षण सिर्फ वेतन नहीं, बल्कि सरकारी आवास (Government Housing) भी है। रेलवे कॉलोनियों, सेना के आवासों, पुलिस लाइनों और सरकारी क्वार्टरों में लाखों कर्मचारी और उनके परिवार रहते हैं। लेकिन इन आवासों की संख्या कितनी है, कितने मकान खाली पड़े हैं और क्या सभी सरकारी कर्मचारियों को मकान मिलता है? इसका जवाब उतना सीधा नहीं है।

सरकारी मकान क्या होते हैं?

सरकारी मकान वे आवास होते हैं जिन्हें सरकार अपने कर्मचारियों को नौकरी के दौरान रहने के लिए उपलब्ध कराती है।

इनमें शामिल हैं:

  • केंद्र सरकार के सरकारी क्वार्टर (GPRA)
  • राज्य सरकार के आवास
  • रेलवे कॉलोनी
  • सेना और रक्षा आवास
  • पुलिस लाइन और पुलिस कॉलोनी
  • न्यायिक आवास
  • सार्वजनिक उपक्रम (PSU) के क्वार्टर

केंद्र सरकार के कितने सरकारी मकान हैं?

केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए सबसे बड़ा आवास नेटवर्क General Pool Residential Accommodation (GPRA) कहलाता है। सरकार ने 2014 में संसद को बताया था कि दिल्ली में GPRA के तहत 59,293 सरकारी आवास उपलब्ध थे। उसी समय इन आवासों की मांग एक लाख से अधिक थी, यानी उपलब्ध मकानों की तुलना में जरूरत काफी ज्यादा थी। यही वजह है कि सरकार लगातार नई सरकारी कॉलोनियां और आवासीय परियोजनाएं विकसित करती रही है।

क्या सरकारी मकानों की कमी है?

दिल्ली का उदाहरण बताता है कि सरकारी मकानों की मांग आज भी अधिक है। लोकसभा में 2010 में दिए गए एक जवाब के अनुसार:

विवरणसंख्या
Type-IV आवासों का कुल स्टॉक5,300
आवंटित मकान5,072
प्रतीक्षा सूची में कर्मचारी2,200

इससे पता चलता है कि कई श्रेणियों में आज भी कर्मचारियों को आवास के लिए इंतजार करना पड़ता है।

रेलवे कॉलोनियां कितनी बड़ी हैं?

भारतीय रेलवे देश के सबसे बड़े नियोक्ताओं में से एक है। 2023 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार रेलवे में लगभग 11.75 लाख नियमित कर्मचारी कार्यरत थे। रेलवे के पास देशभर में विशाल आवासीय नेटवर्क है, जिसमें रेलवे क्वार्टर, रेलवे कॉलोनियां और कर्मचारी आवास शामिल हैं।

हालांकि रेलवे कॉलोनियों की कुल संख्या का कोई एक राष्ट्रीय आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन रेलवे भारत के सबसे बड़े सरकारी आवास प्रदाताओं में शामिल है।

सेना और रक्षा आवास

भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए अलग आवासीय व्यवस्था होती है। इनमें प्रमुख हैं:

  • Married Accommodation Project (MAP)
  • Cantonment Housing
  • Military Stations

इन योजनाओं के तहत लाखों सैनिकों और अधिकारियों के परिवारों को आवास उपलब्ध कराया जाता है।

कितने सरकारी मकान खाली पड़े हैं?

सरकारी आवासों की कहानी का दूसरा पहलू खाली पड़े मकान हैं। आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) की Affordable Rental Housing Complex (ARHC) योजना के तहत देशभर में 83,534 सरकारी वित्तपोषित मकान खाली पाए गए थे।

सबसे ज्यादा खाली मकान वाले राज्य

राज्यखाली मकान
महाराष्ट्र32,345
दिल्ली29,112
उत्तर प्रदेश5,232
Rajasthan4,884
गुजरात4,414

यह आंकड़ा केवल ARHC योजना के तहत पहचाने गए सरकारी वित्तपोषित आवासों का है, सभी सरकारी क्वार्टरों का नहीं।

क्या सभी सरकारी कर्मचारियों को सरकारी मकान मिलता है?

नहीं। भारत में ऐसा कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है जो बताता हो कि कुल कितने सरकारी कर्मचारी सरकारी आवास में रहते हैं। कई कर्मचारियों को HRA (House Rent Allowance) मिलता है। निजी मकान किराए पर लेना पड़ता है। स्वयं का घर होता है। इसलिए सरकारी नौकरी होने का मतलब यह नहीं कि कर्मचारी को सरकारी मकान भी मिलेगा।

सरकारी मकानों का किराया कितना होता है?

सरकारी मकान पूरी तरह मुफ्त नहीं होते। इन पर लाइसेंस फीस (License Fee) ली जाती है, जिसे आम बोलचाल में सरकारी किराया कहा जाता है। सरकारी आवासों का किराया कर्मचारी के पद पर, आवास की श्रेणी (Type-I से Type-VI), शहर और स्थान पर भी निर्भर करता है। आमतौर पर यह बाजार दर से काफी कम होता है, इसलिए इसे सरकारी नौकरी का एक बड़ा लाभ माना जाता है।

सबसे बड़ा भ्रम क्या है?

बहुत से लोग मानते हैं कि सभी सरकारी कर्मचारियों को सरकारी मकान मिलता है। वास्तविकता यह है कि

  • सरकारी मकानों की संख्या सीमित है।
  • कई शहरों में प्रतीक्षा सूची रहती है।
  • बड़ी संख्या में कर्मचारी HRA लेकर निजी मकानों में रहते हैं।
  • हजारों सरकारी मकान ऐसे भी हैं जो वर्षों तक खाली पड़े रहते हैं।

यानी भारत में एक तरफ आवास की मांग है, तो दूसरी तरफ कुछ स्थानों पर सरकारी मकान खाली भी पड़े हैं।