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मां सती के यहां गिरे थे नैत्र, तब जाकर ये शक्ति पीठ बनी नैना देवी

मानसखंड के प्राचीन पाठ के अनुसार भी गंधमादन पर्वत पर...
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भोपाल

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Deepesh Tiwari

•

Updated: 29 Mar 2020, 1:00 PM IST

nena devi shakti peeth one of the temple in 51 shakti peeth of maa durga

nena devi shakti peeth one of the temple in 51 shakti peeth of maa durga

नवरात्रि के पावन दिन आ गए हैं और इन दिनों मां की पूजा अर्चना का विशेष महत्व होता है। नवरात्रि में मां के 9 रुपों की पूजा का विधान है। आज नवरात्रि के मौके पर हम मां के पावन शक्तिपीठ के बारे रहे हैं, जहां सती माता के नैत्र गिरे थे। एक ओर जहां कुछ लोग हिमाचल प्रदेश के जिला बिलासपुर में माता के नैत्र गिरने की बात कहते हैं।

वहीं दूसरी ओर यह भी माना जाता है कि उत्तरांचल के नैनीताल में नैनी झील के किनारे देवी सती के नेत्र गिरे थे। यहां देवी मां का यह अनुपम मंदिर है, जिसका नाम नैना देवी है। इसे शक्तिपीठ का दर्जा प्राप्त है। इस मंदिर में दो नेत्र हैं, जो मां नैना देवी को दर्शाते हैं।

मानसखंड के प्राचीन पाठ के अनुसार भी गंधमादन पर्वत पर, जो अब उत्तरांचल के कुमाउं में है, देवदार के उंचे वृक्ष की छाया में एक छोटा सा मंदिर था। यहां माता सती की आंखें गिरी थी। वहीं नैना देवी की झील भी बन गई।

कुल मिलाकर 51 शक्ति पीठियों में से एक शक्ति पीठ श्री नैना देवी मंदिर है, जहां पर माता सती की आंखें गिरी थी।

नैनीताल स्थित नैना देवी मंदिर के संबंध में ये भी मान्यता है कि यहां मां के आंखों से गिरे आंसू ने ही यहां ताल का रूप धारण कर लिया और इसलिए इस जगह का नाम नैनीताल पड़ गया। इस मंदिर के अंदर नैना देवी के साथ-साथ गणेश जी और मां काली की भी मूर्तियां मौजूद हैं।

नैनीताल: नैना देवी मंदिर
मंदिर परिसर में मां को चढ़ाने के लिए पूजा सामग्री मिल जाती है। ऐसा माना जाता है कि माता के दर्शन मात्र से ही लोगों के नेत्र रोग की पीड़ा से मुक्ति मिल जाती है।

नैनीताल: मेले का आयोजन
नैना देवी मंदिर शक्ति पीठ मंदिरों मे से एक माना जाता है। नैना देवी मंदिर में नवरात्र का त्यौहार उत्सव के रूप में मनाया जाता है। वर्ष में आने वाली दोनों नवरात्र, चैत्र मास और अश्‍विन मास के नवरात्रि में यहां पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।

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मां नैना देवी: ये है कथा...
उत्तराखंड के नैनीताल में नैनी झील के उत्तरी किनारे पर नैना पहाड़ी के ऊपर यह मंदिर स्थित है। इस मंदिर के प्रमुख देवता मां नैना देवी हैं, जिनका प्रतिनिधित्व दो नेत्रों या आंखों द्वारा किया जाता है। नैनीताल प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है, जिसे हिंदू धर्म के धार्मिक स्थलों के रूप में भी जाना जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी सती ने उनके पिता दक्षेस्वर (राजा दक्ष) द्वारा किए यज्ञ कुण्ड में अपने प्राण त्याग दिये थे, तब भगवान शंकर देवी सती के मृत शरीर को लेकर पूरे ब्रह्माण चक्कर लगा रहे थे इसी दौरान भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया था, जिसमें से सती की आंखें (नैना) इस स्थान गिरी थीं। । नैना देवी का मंदिर उस स्थान पर बनाया गया है जहाँंदेवी की आंखें (नैना) गिरी थीं।

माना जाता है कि एक प्राचीन मंदिर 15 वीं शताब्दी में बनाया गया था। मंदिर के पीछे 167 गज चौड़ा और कई मीटर गहरा एक तालाब है। मंदिर का द्वार बाईं ओर विशाल पीपल के पेड़ से चिह्नित है। दायीं ओर भगवान हनुमान और भगवान गणेश की मूर्तियां हैं।

मंदिर के अंदर माता काली देवी, मां नैना देवी और भगवान गणेश की मूर्तियां स्थापित हैं। भाद्रपद शुक्ल अष्टमी पर हर साल 1918-19 के बाद से महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में मनाए जाने वाले उत्सव के समान प्रतिमा विसर्जन समारोह यहां किया जाता है।

नैना देवी: ऐसे पहुंचें...
उत्तरखंड में स्थित यह पर्यटन स्थल सड़क मार्ग के जरिये देश के मुख्य शहरों से जुड़ा हुआ है। अगर आप रेल से नैनीताल जाना चाहते हैं तो इसके लिए आपको कोठगोदाम स्टेशन पर उतरना होगा। वहां से नैनीताल तक टेक्सी या बस की सहायता से आप मंदिर तक पहुंच सकते हैं।

पौराणिक कथा...
एक पौराणिक कथा के अनुसार, देवी सती ने खुद को यज्ञ में जिंदा जला दिया, जिससे भगवान शिव व्यथित हो गए। उन्होंने सती के शव को कंधे पर उठाया और तांडव नृत्य शुरू कर दिया। ऐसा करने स्वर्ग में विद्यमान सभी देवता भयभीत हो गये कि भगवान शिव का यह रूप प्रलय ला सकता है।

देवताओं ने भगवान विष्णु से यह आग्रह किया कि अपने चक्र से सती के शरीर को 51 टुकड़ों में काट दें। विष्णु जी ने सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिये। शरीर का जो भाग जिस क्षेत्र में गिरा वहं पर एक शक्ति पीठ की स्थापना हो गई। इस प्रकार से 51 शक्ति पीठ स्थापना हुई।

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