
रायपुर में मिली नई नगरी, 2606 ताम्र सिक्कों की मुद्रा निधि और बहुत कुछ... ये खोज बदल देगी छत्तीसगढ़ के इतिहास की दिशा(photo-patrika)
CG News: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 25 किलोमीटर पूर्व स्थित ग्राम रीवां आज प्रदेश के इतिहास को नई दिशा देने वाला स्थल बन चुका है। कोलहान नाला और बंधुआ तालाब के मध्य स्थित यह प्राचीन पुरातात्विक स्थल, जिसे स्थानीय रूप से रीवांगढ़ कहा जाता है, छत्तीसगढ़ की विशिष्ट मृत्तिकागढ़ (मडफोर्ट) परंपरा का जीवंत उदाहरण है।
रीवां क्षेत्र में पीढ़ियों से चली आ रही लोरिक-चंदा की लोककथा इस स्थल को सांस्कृतिक पहचान देती है। आमतौर पर ऐतिहासिक स्थलों से जुड़ी किंवदंतियां समय के साथ धुंधली हो जाती हैं, लेकिन रीवां में लोकस्मृति और पुरातात्विक साक्ष्य एक-दूसरे की पुष्टि करते नजर आते हैं।
ग्राम रीवां में विशाल बंधुआ तालाब के किनारे चंडी मंदिर के पास लगभग 75 एकड़ क्षेत्रफल में फैला मृत्तिकागढ़ मौजूद है। इसके चारों ओर खाई और परकोटे के अवशेष इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यह स्थल किसी समय सुदृढ़ नगरीय बसावट रहा होगा।
सन् 1975 में इसी स्थल से 35 स्वर्ण सिक्के प्राप्त हुए थे, जो वर्तमान में विभागीय संरक्षण में हैं। इसके अलावा, गांव की सीमा में राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित एक बड़े टीले को पूर्ववर्ती इतिहासकारों ने स्तूप होने की संभावना से जोड़ा था। इन्हीं तथ्यों के आधार पर वर्ष 2019 में व्यवस्थित उत्खनन का निर्णय लिया गया।
संचालनालय के उप संचालक डॉ. पी.सी. पारख के निर्देशन और डॉ. वृषोत्तम साहू के सह-निर्देशन में उत्खनन कार्य शुरू हुआ। दो प्रमुख टीलों में अलग-अलग गहराई तक उत्खनन किया गया, जहां लगभग 7 मीटर नीचे नैचुरल मिट्टी तक पहुंचा गया। विभिन्न स्तरों से अलग-अलग कालखंडों के पुरावशेष सामने आए।
मौर्य से कुषाण काल तक व्यापारिक गतिविधियों के प्रमाण
उत्खनन में मौर्य, शुंग, सातवाहन, शक-क्षत्रप, मघ, कुषाण और स्थानीय सिक्के मिले हैं। इनसे स्पष्ट होता है कि रीवां विभिन्न कालों में एक सक्रिय व्यापारिक केंद्र रहा। अभिलिखित मृण्मय और धातु मुद्राएं, मुहर और मुद्रांक दूसरी सदी ईसा पूर्व से 7वीं सदी ईसवी के बीच की समृद्ध आर्थिक गतिविधियों की कहानी कहते हैं।
छत्तीसगढ़ में पहली बार किसी पुरास्थल का रेडियोकार्बन (AMS Carbon-14) पद्धति से वैज्ञानिक काल निर्धारण किया गया। उत्खनन के निचले स्तरों से प्राप्त चारकोल के नमूने अमेरिका की ISO प्रमाणित बीटा एनालिटिक्स (फ्लोरिडा) प्रयोगशाला भेजे गए।
रेडियोकार्बन परीक्षण रिपोर्ट के अनुसार, पहले सैंपल की तिथि 650 से 543 ईसा पूर्व निर्धारित हुई है, जो बुद्ध के समकालीन महाजनपद काल की पुष्टि करती है। दूसरा सैंपल 806 से 748 ईसा पूर्व का पाया गया, जो उत्तर वैदिक काल अथवा लौह युग का संकेत देता है।
वहीं, तीसरे सैंपल की तिथि 541 से 392 ईसा पूर्व सामने आई है, जो बुद्ध काल से लेकर मौर्य काल तक के समय को दर्शाती है। इन वैज्ञानिक प्रमाणों से यह स्पष्ट हो गया है कि रीवां क्षेत्र में उत्तर वैदिक काल से निरंतर मानव बसावट रही है, जो छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास को नई दिशा देती है।
उत्खनन में लौह युगीन मृदभांडों के साथ चित्रित मृदभांड और लोहे के औजार बनाने की कार्यशाला के प्रमाण भी मिले हैं। यह छत्तीसगढ़ में अब तक का पहला ऐसा पुरातात्विक साक्ष्य है।
हालिया उत्खनन सत्र में 2606 ताम्र सिक्कों की मुद्रा निधि प्राप्त हुई है। ये पहली-दूसरी शताब्दी ईसवी के बीच प्रचलित गज-देवी प्रकार के स्थानीय सिक्के हैं। इसके साथ ही रीवां भारत के उन गिने-चुने स्थलों में शामिल हो गया है, जहां इतनी बड़ी मुद्रा निधि मिली है।
शोध के अनुसार रीवां में 800–400 ईसा पूर्व के बीच मानव बस्ती के पुख्ता प्रमाण हैं और इसकी निरंतरता 700 ईसवी तक बनी रही। इस आधार पर रीवां की तुलना देश के प्राचीन नगरों जैसे कौशांबी और अहिछत्र से की जा रही है।
रीवां उत्खनन ने यह प्रमाणित कर दिया है कि छत्तीसगढ़ केवल मध्यकालीन नहीं, बल्कि उत्तर वैदिक और लौह युगीन सभ्यता का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यह खोज प्रदेश के इतिहास लेखन, शोध और भावी उत्खननों के लिए एक मील का पत्थर साबित होगी।
Updated on:
13 Jan 2026 03:34 pm
Published on:
13 Jan 2026 03:21 pm

बड़ी खबरें
View Allखास खबर
ट्रेंडिंग
