14 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Green Crackers: जानिए, क्या हैं ग्रीन पटाखे और क्यों इनके जलाने पर रोक नहीं है

Highlights: -आप जरूर सोच रहे होंगे कि green patake kya hai -लोग पटाखों (Green Crackers) के बिना दिवाली को अधूरा बताते हैं -Diwali पर लोग जमकर आतिशबाजी करते हैं

2 min read
Google source verification
green.jpg

नोएडा। green patake green crackers price kya hai। दिवाली (Diwali 2019) का हर किसी को इंतजार रहता है। हो भी क्यों न, ये त्योहार करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक जो माना जाता है। इस त्योहार पर लोग मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा अर्चना करते हैं। साथ ही पूरे घर में दीपक जलाते हैं, इसके चलते दिवाली को रोशनी का त्योहार भी कहा जाता है। वहीं इस त्योहार पर मिठाई के अलावा सबसे मुख्य चीज पटाखे (Green Patake) भी कहना गलत नहीं है। कारण, लोग पटाखों (Green Crackers) के बिना दिवाली को अधूरा बताते हैं।

यह भी पढ़ें: सख्त आदेश के बावजूद ग्रीन पटाखों की आड़ में खूब बिक रहे अवैध पटाखे, पुलिस अफसरों ने किया ये दावा

लेकिन, प्रदूषण के चलते एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पटाखों पर रोक लगा दी गई है। हालांकि लोगों की आस्था को देखते हुए ग्रीन पटाखे चलाने की अनुमित दे दी गई है। जिससे पटाखा उद्योग भी बंद होने से बच गए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन पटाखों को ग्रीन पटाखे या ग्रीन क्रैकर्स क्यों कहा जाता है। आइए जानते हैं।

यह भी पढ़ें : दिवाली पर उल्लू और तोते की बढ़ी डिमांड तो वन विभाग ने जारी किया अलर्ट, बाजारों में उतरी टीमें, देखें वीडियो

तीन तरह के होते हैं ग्रीन पटाखे

नोएडा में श्रीराम फायर क्रैकर्स के मालिक विरेंद्र कुमार के मुताबिक ग्रीन पटाखे अन्य पटाखों की तुलना में 30 फीसदी तक कम प्रदूषण करते हैं। इन्हें पटाखे को वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान-राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (CSIR-NEERI) द्वारा विकसित किया गया है। वह बताते हैं कि CSIR-NEERI द्वारा विकसित गए नए ग्रीन पटाखे तीन तरह के हैं। एक तरह के जलने पर पानी पैदा करते हैं, जिससे सल्फर और नाइट्रोजन जैसी हानिकारक गैस पटाखे के फटने के साथ ही पानी में घुल जाती है। दूसरे तरह के स्टार क्रैकर के नाम से जाने जाते हैं। ये सामान्य से कम सल्फर और नाइट्रोजन पैदा करते हैं। इनमें एल्युमिनियम का कम से कम इस्तेमाल किया जाता है। वहीं तीसरी तरह के अरोमा क्रैकर्स होते हैं, जो कम प्रदूषण के साथ-साथ खुशबू भी पैदा करते हैं।