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कारगिल में प्राण गंवाने वाले जांबाज कैप्टन के अंतिम पत्र को पढ़ भर आएंगी आपकी आंखें

मुझे कोई पछतावा नहीं है कि जिन्दगी अब खत्म हो रही है, बल्कि अगर फिर से मेरा जन्‍म हुआ तो मैं एक बार फिर सैनिक बनना चाहूंगा और अपनी मातृभूमि के लिए मैदान-ए-जंग में लड़ूंगा। पापा, आपको अवश्‍य ही मुझ पर गर्व होगा और मां भी मुझ पर गर्व करेंगी।

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lokesh verma

Jul 26, 2016

captain vijyant thapar last letter

captain vijyant thapar last letter

नोएडा।
नोएडा के रहने वाले 22 साल के कैप्टन विजयंत थापर ने भी देश की रक्षा के लिए अपनी जान दी थी। जब उनका शव नोएडा पहुंचा तो पूरा नोएडा जाम हो गया था।


कैप्टन विजयंत थापर की यूनिट तोलोलिंग की पहा​ड़ियों पर कब्जा करने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रही थी, लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी। बताया जाता है कि जब आलाकमान ने इस मिशन पर किसी दूसरी यूनिट को भेजने की बात कही तो कैप्टन थापर ने आगे बढ़कर इस मिशन को अपने हाथ में लिया और लंबे समय से अटकी सफलता को केवल 11 घंटों में प्राप्त किया। वह तोलोलिंग पर कब्जा करने के बाद अपने अगले मिशन पर निकले।


अगला प्वाइंट आसान नहीं था। यहां उनकी यूनिट तोलोलिंग और टाइगर हिल के बीच फंसी थी और ऊपर पहाड़ी पर पाकिस्तानी सेना कब्जा जमाए बैठी थी। 29 जून की रात 15 हजार फुट की सीधी सपाट चढ़ाई को पार करना आसान नहीं था। रात का तापमान -15 डिग्री सेल्सियस था। जैसे ही थापर अपने कमांडर और यूनिट के साथ चढ़ाई पूरी कर ऊपर पहुंचे तो दुश्मन ने 100 एमएम की मशीन गन से फायरिंग शुरू कर दी।


कंपनी कमांडर के साथ अधिकतर जवान शहीद हो गए या घायल हो गए। ऐसे में थापर आगे आए और मोर्चा संभाला। थापर दुश्मन की मशीन गनों से केवल 15 मीटर की दूरी पर थे कि दुश्मनों ने फायरिंग शुरू कर दी। देश के बेटे ने गोली अपने माथे पर खाई और शहीद हो गया। बताया जाता है कि वह अपने साथी नायक तिलक सिंह की बाहों में गिरे थे।


सेकेंड राजपूताना राइफल्स के कैप्टन विजयंत थापर ने शहादत के ठीक पहले अपने परिजनों को एक पत्र लिखा था। इस पत्र को पढ़कर कोई भी यह समझ सकता है कि लड़ाई के मोर्चे पर भी उनके हौंसले कितने बुलंद थे।


अमर शहीद कैप्टन विजयंत थापर ने लिखा था कि-



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प्‍यारे मम्‍मी-पापा, बर्डी और ग्रैनी

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जब तक आप लोगों को यह पत्र मिलेगा, मैं ऊपर आसमान से आप को देख रहा होऊंगा और अप्‍सराओं के सेवा-सत्‍कार का आनंद उठा रहा होऊंगा।


मुझे कोई पछतावा नहीं है कि जिन्दगी अब खत्म हो रही है, बल्कि अगर फिर से मेरा जन्‍म हुआ तो मैं एक बार फिर सैनिक बनना चाहूंगा और अपनी मातृभूमि के लिए मैदान-ए-जंग में लड़ूंगा।


अगर हो सके तो आप लोग उस जगह पर जरूर आकर देखिए, जहां आपके बेहतर कल के लिए हमारी सेना के जांबाजों ने दुश्मनों से लोहा लिया था।


जहां तक इस यूनिट का सवाल है, तो नए आने वालों को हमारे इस बलिदान की कहानियां सुनाई जाएंगी और मुझे उम्‍मीद है कि मेरा फोटो भी 'ए कॉय' कंपनी के मंदिर में करणी माता के साथ रखा होगा।


आगे जो भी दायित्‍व हमारे कंधों पर आएंगे, हम उन्‍हें पूरा करेंगे।


मेरे आने वाले पैसों में से कुछ भाग अनाथालय को भी दान कीजिएगा और रुखसाना को भी हर महीने 50 रु. देते रहिएगा (रुखसाना एक पांच-छह साल की बच्ची ​थी, जिसके माता-पिता एक आतंकी हमले में मारे गए थे। इसके बाद उसकी आवाज चली गई थी, लेकिन विजयंत थापर से मिलने के बाद उसकी आवाज पांच महीनों में वापस आ गई थी। दोनों एक-दूसरे के साथ खेलते थे। विजयंत उस बच्ची को बेटी की तरह प्यार करते थे।) और योगी बाबा से भी मिलिएगा।


बेस्‍ट ऑफ लक टू बर्डी। हमारे बहादुरों का यह बलिदान कभी भूलना मत। पापा, आपको अवश्‍य ही मुझ पर गर्व होगा और मां भी मुझ पर गर्व करेंगी। मामाजी, मेरी सारी शरारतों को माफ करना। अब वक्‍त आ गया है कि मैं भी अपने शहीद साथियों की टोली में जा मिलूं।


बेस्ट ऑफ लक टू यू ऑल।


लिव लाइफ किंग साइज।