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हरियाली तीज पर खत्म हुई थी इनकी प्रेम कहानी, राजस्थान से यूपी तक फैले हैं इनके प्रेम के किस्से

प्रेम के प्रतीक की बात की जाए तो सभी के जेहन में ताजमहल का नाम सामनेे आता है। लेकिन प्रेम के सच्चे प्यार की कहानी बयां करने वाला एक ताजमहल हीं नहीं, बल्कि वेस्ट यूपी में सती निहालदे मंदिर एक प्रेम की इबादत है।

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nihlde

हरियाली तीज पर खत्म हुई थी इनकी प्रेम कहानी, राजस्थान से यूपी तक फैले है इनके प्रेम के किस्से

नोएडा. प्रेम के प्रतीक की बात की जाए तो सभी के जेहन में ताजमहल का नाम सामनेे आता है। लेकिन प्रेम के सच्चे प्यार की कहानी बयां करने वाला एक ताजमहल हीं नहीं, बल्कि वेस्ट यूपी में सती निहालदे मंदिर एक प्रेम की इबादत है। कभी यहां नौलखा बाग हुआ करता था। इसी बाग में राजस्थान के राजकुमार नरसुल्तान ने राजा मघ की बेटी राजकुमारी निहालदे को देखा था। यहीं दोनों के बीच में प्यार परवान चढ़ा।

कासना गांव नहीं, हुआ करता था बाग

कासना के निहालदे का मंदिर आज जिस जगह पूरे वैभव के साथ में विराजमान है। कभी यहां नौलखा बाग हुआ करता था। इस दनकौर से लेकर सूरजपुर तक फैले बाग में नौ लाख पेड़ हुआ करते थे। फिलहाल यहां कासना गांव बसा हुआ है। कासना गांव में सती निहालदे का मंदिर आज भी मौजूद है। यह कभी राजा मघ की राजधानी हुआ करती थी। राजा मघ की बेटी राजकुमारी निहालदे अपनी सहेलियों के साथ झूला झूलती थीं।

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ऐसे हुआ प्रेम

एक दिन राजस्थान के कीचगढ़ का राजकुमार नरसुल्तान केशवगढ़ के राजकुमार फूल कंवर के साथ में घूमते हुए यहां आ गए। काफी रास्ता तय करने केे बाद में दोनों नौलखा बाग में आराम के लिए रुक गए। उसी दौरान बाग में राजा मघ की बेटी राजकुमार निहालदे अपनी सहेलियोंं के साथ में बाग में आ गई। नरसुल्तान उस पर फिदा हो गया और उसने शादी का प्रस्ताव रख दिया। राजा मघ ने दोनों की शादी करा दी। शादी के बाद में नरसुल्तान अपनी रानी को लेकर केशवगढ़ पहुंच गया। लेकिन दोनों के शादी नरसुल्ताल के पिता को अच्छी नहीं लगी। उसने नरसुल्तान को निकाल दिया।

बाद में वह केशवगढ़ आकर रहने लगा। उधर, फूलकंवर का मन निहालदे पर आ गया। इस कारण उसने नरसुल्तान को मारने का प्रयास किया था, लेकिन नरसुल्तान बच गया और उसने केशवगढ़ के राजा को यह बात ताई। लेकिन उसने अपने पुत्र का पक्ष लिया और उन्हें निकाल दिया।

हरियाली तीज पर रानी खुद को कर लिया भस्म

केशवगढ के राजा का आदेश मिलने के बाद में नरसुल्तान वहां से जाने लगा तो निहलदे ने भी उसके साथ जाने की जिद की। नरसुल्तान ने रानी से सावन माह में हरियाली तीज पर वापस आने का आश्वासन देकर वहां से चले गए। काफी अरसे तक नरसुल्ताल वापस नहीं पहुंचे तो वियोग के चलते रानी भी पिता के घर आ गई। निहालदे ने प़त्र भेजकर नरसुल्तान को हरियाली तीज पर बुलया था। लेकिन उसके पत्र को मारु ने दबाए रखा। एक दिन जब वह पत्र नरसुल्तान के हाथ लग गया। पत्र में लिखा था कि वह तीज के दिन उसके न पहुंचने पर सती हो जाएगी। तीज पर सुल्तान को निहालदे के पास आने में कुछ देर हो गई और उधर इधर निहालदे ने अपने प्रण के अनुसार खुद को जलती हुई चिता में भस्म कर दिया। रानी निहालदे की याद में सुल्तान ने यहां उसका मंदिर बनवाया, जो आज भी पूरे गौरव के साथ विराजमान है। प्रेम के इस प्रतीक को देखने के लिए आज भी दूर—दूर से लोग देखने आते है।

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