
हवा में घुलते जहर यानी वायु प्रदूषण का खतरा ऐसा है जो दिखता भी है और महसूस भी होता है। लेकिन इस खतरे का मुकाबला करने के लिए जब काम करने की बारी आती है तो सब एक-दूसरे का मुंह ताकते नजर आते हैं। यूनिसेफ और हैल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट (अमरीका का एक स्वतंत्र गैर-लाभकारी शोध संस्थान) की रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर' की ताजा रिपोर्ट बढ़ते वायु प्रदूषण के इन्हीं खतरों की ओर आगाह करती है जिनको लेकर हम बेपरवाह नजर आते हैं।
इस रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि अकेले वायु प्रदूषण के कारण दुनिया में हुई मौतों का एक चौथाई भारत से जुड़ा है। हैरत की बात यह है कि मौतों के ये आंकड़े वर्ष २०२१ के उस दौर के हैं जब कोरोना महामारी के चलते आम तौर पर सभी तरह का यातायात काफी समय तक बाधित रहा। दुनिया में वायु प्रदूषण के कारण ८४ लाख मौतें हुईं जिनमें से २१ लाख भारत में हुई हैं। साफ है कि बढ़ते प्रदूषण के बीच हम जिस हवा में सांस ले रहे हैं वह साल दर साल लाखों लोगों की जान की दुश्मन बन गई है।
कहना न होगा पर सच यह भी है कि दुनिया भर में युद्ध, आतंकवाद व गंभीर बीमारियों से मौतों का जितना खतरा है उससे कई गुना ज्यादा खतरा हवा में घुलते इस जहर का है। खास तौर से जब हम भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मौत के कारणों की पड़ताल करते हैं तो कुपोषण के बाद इसकी बड़ी वजह वायु प्रदूषण ही है। वर्ष २०२१ के दौरान भारत में 1,६९,४०० बच्चों की मौत वायु प्रदूषण जनित कारणों से हुई, जबकि दुनिया भर में वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से पांच वर्ष से कम उम्र के 700,000 से अधिक बच्चों की मौत हुई। इसी अवधि के दौरान शहरों में वायु प्रदूषण के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार भले ही मोटर-वाहन हों पर एक तथ्य यह भी है कि इस प्रदूषण से बीमारियों का शिकार निचले तबके से जुड़े लोग ज्यादा होते हैं। ठीक वैसे ही जैसे पूरी दुनिया में सिर्फ 10 प्रतिशत लोग ग्लोबल वार्मिंग से जुड़ी ग्रीनहाउस गैसों के अधिकांश उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं लेकिन उसका नुकसान समूची दुनिया, खास तौर पर निर्धन वर्ग को उठाना पड़ता है।
वायु प्रदूषण को लेकर पिछले दिनों ही आई एक अन्य रिपोर्ट में चेताया गया था कि जहरीली हवा का यही हाल रहा तो भारतीयों की औसत उम्र छह साल कम होने का खतरा पैदा हो जाएगा। इस जहर का असर कम करने के लिए सख्त कानून-कायदे बनाकर सजा और जुर्माने तक के प्रावधान भी खूब हुए हैं, लेकिन असली जरूरत जन-जागरूकता की है।
Published on:
20 Jun 2024 09:21 pm
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