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आपका हक : कर्तव्य का भी ध्यान रखें अधिवक्ता

अधिनियम, 1961 की धारा 49(1)(सी) के तहत वकील के कोर्ट, क्लाइंट (पक्षकार), प्रतिवादी के प्रति क्या कर्तव्य हैं, इनका उल्लेख बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों में किया गया है।

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आपका हक : कर्तव्य का भी ध्यान रखें अधिवक्ता

आपका हक : कर्तव्य का भी ध्यान रखें अधिवक्ता

- विभूति भूषण शर्मा

( लेखक राजस्थान सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता हैं)

प्रत्येक व्यवसाय की तरह विधि व्यवसाइयों अर्थात अधिवक्ताओं के लिए भी अधिवक्ता अधिनियम 1961 के अंतर्गत पंजीकरण से लेकर अधिवक्ता प्रैक्टिस अधिकार और कर्तव्य, अनुशासनात्मक कार्रवाई, सर्टिफिकेट निरस्तीकरण और अपील तक के प्रावधान हैं। अधिनियम, 1961 की धारा 49(1)(सी) के तहत वकील के कोर्ट, क्लाइंट (पक्षकार), प्रतिवादी के प्रति क्या कत्र्तव्य हैं, इनका उल्लेख बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों में किया गया है। अदालत और जज के प्रति वकील के कर्तव्य हैं कि वह सम्मानजनक तरीके से कार्य करे, कोर्ट का सम्मान करे, व्यक्तिगत संवाद से परहेज करे, प्रतिवादी के प्रति अवैध तरीके न अपनाए, अनुचित साधनों पर जोर देने वाले क्लाइंट का प्रतिनिधित्व न करे, निर्धारित ड्रेस कोड पहने। यदि जज से कोई रिश्तेदारी है तो उसमें पैरवी न करे, सार्वजनिक स्थानों पर गाउन नहीं पहने। अपने ही क्लाइंट का जमानती न बने।

क्लाइंट के प्रति एक वकील के कर्तव्य के रूप में अधिवक्ता ब्रीफ स्वीकार करने के लिए बाध्य होगा। मुवक्किल की पैरवी करने के लिए सहमत होने के बाद बिना युक्तियुक्त कारण के पीछे नहीं हटना चाहिए। क्लाइंट के हितों के प्रति सजगता और जागरूकता हो। मुकदमेबाजी के लिए ना उकसाए। वकील को अपने मुवक्किल या उसके अधिकृत एजेंट के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के निर्देश पर कार्य नहीं करना चाहिए। मामलों की सफलता के आधार पर शुल्क नहीं लेना चाहिए। कार्रवाई योग्य दावे में ब्याज, शेयर आदि प्राप्त नहीं करना चाहिए। एक अधिवक्ता को अपने मुवक्किल के विश्वास का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए या उसका लाभ नहीं उठाना चाहिए। फीस का हिसाब पारदर्शी होना चाहिए और फीस की रसीद देनी चाहिए।

एक बार अपने क्लाइंट के लिए पैरवी करने के पश्चात प्रतिवादी के लिए उपस्थित नहीं हुआ जा सकता। प्रतिवादी के साथ सीधे बातचीत नहीं करनी चाहिए। इसी तरह कुछ अन्य व्यावसाइक बाध्यताएं भी हैं। मसलन स्वयं का विज्ञापन न करे या केस पाने के लिए याचना न करे, निर्धारित नियमों के तहत ही निश्चित आकार का साइन-बोर्ड और नेम-प्लेट का उपयोग करे। जिस केस में पहले से कोई साथी अधिवक्ता है और क्लाइंट उसे बदलना चाहता हो तो साथी अधिवक्ता की सहमति आवश्यक है। सहमति देना साथी अधिवक्ता का नैतिक दायित्व है।