
फाइल फोटो
देश में दो चीजें कभी नियंत्रण में नहीं आतीं। एक कुत्तों की आबादी और दूसरी कमीशन की भूख। फर्क बस इतना है कि कुत्तों पर बहस खुलकर होती है और कमीशन पर फुसफुसाहट में। कुत्तों की खबरों से अखबार भरे रहते हैं। सोशल मीडिया पर हर दूसरे दिन वीडियो आते हैं। कहीं कुत्ते का हमला, कहीं कुत्ते पर हमला। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा, अंधाधुंध मारना समाधान नहीं। वैज्ञानिक नसबंदी और टीकाकरण से आबादी नियंत्रित करो। नियम बने। बजट पास हुआ। फाइलें चलीं। फोटो खिंचे। प्रेस नोट जारी हुए। और फिर… फिर वही प्रशासनिक चमत्कार। जमीन पर कुत्ते जस के तस।
कागजों पर शहर ‘नियंत्रित’। जयपुर के दो अफसरों ने तो पारदर्शिता की नई परिभाषा गढ़ दी। उन्हें नसबंदी से कोई आपत्ति नहीं थी, बस पहले नोटबंदी करा दो। संदेश भी एकदम साफ। 75 लाख रुपए चाहिए तो 15 लाख निकालो। और ऊपर से यह भी कि ईमानदारी से काम करने के लिए किसने कहा? जनहित का गणित भी कमाल का है। पहले हिस्सा, फिर सेवा। सच तो यही है कि कुत्तों की नसबंदी से पहले ईमानदारी की नसबंदी हो चुकी है।
वरना इतना आत्मविश्वास कहां से आता? इतना भरोसा कि फाइल रुकेगी नहीं! मगर यह सवाल दो अफसरों का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है, जहां बिना संरक्षण के कोई इतना निर्भीक नहीं होता। भ्रष्टाचार कभी अकेला नहीं चलता। वह संकेतों की छाया में पलता है। मौन की ढाल में बढ़ता है… और पकड़े जाने पर चंद चेहरों के साथ उजागर होता है, सिस्टम जस का तस खड़ा रहता है।
अब जरा प्राथमिकताओं की एक्स-रे रिपोर्ट देखिए। कुत्तों पर खर्च के लिए करोड़ों उपलब्ध हैं। होना भी चाहिए। रेबीज सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रश्न है। मगर साफ पेयजल? रामगढ़ की कहानी किसी से छिपी नहीं। बांध सूख गया, पर कागजों में परियोजनाएं लबालब रहीं। तालाब खाली थे, पर टेंडर भरे हुए। अफसर पूरा का पूरा बांध ही गटक गए। जब मुयमंत्री के आश्वासनों पर भी नौकरशाहों का ध्यान नहीं है तो फिर बेड़ा गर्क होना तय है। यह भी मजेदार ही है, कुत्तों के लिए बजट समय पर और पानी के लिए आश्वासन समय-समय पर। लगता है हमारी प्राथमिकताओं की पूंछ भी टेढ़ी है।
विडंबना देखिए। रेबीज जनता के पैर जकड़ कर खड़ी है और दूषित पानी सिर के ऊपर पहुंच गया है। एक ओर नसबंदी के बिल और दूसरी ओर सूखे नल-सूखा रामगढ़… और बीच में सिस्टम खड़ा है, वो भी पूरी शालीनता से कहता हुआ… ‘सब नियंत्रण में है।’ असल सवाल कुत्तों का नहीं, नियंत्रण का है। क्या हम आबादी नियंत्रित कर रहे हैं या नैतिकता का क्षरण पूरा कर चुके हैं? क्या हम स्वास्थ्य बचा रहे हैं या हिसाब-किताब साध रहे हैं?
भ्रष्टाचार का मॉडल एकदम सरल है। फाइल रोको। हिस्सा लो। बिल पास करो। जनता पूछे तो कहो-नसबंदी कर तो दी। कुत्ते भौंकते रहेंगे। नल सूखते रहेंगे। और हम आंकड़े पढ़ते रहेंगे। सब जानते हैं, कुत्ते की पूंछ सीधी नहीं होती। पर अब लगता है, हमने पूंछ को दोष देकर अपनी रीढ़ की जिमेदारी छोड़ दी है। चाणक्य ने लिखा था, राजकोष जनता का है। अफसरों ने नया सिद्धांत गढ़ लिया है, ‘राजकोष अवसर है।’
अंत में सीधा सवाल। नसबंदी कुत्तों की होगी या कमीशन की? पानी बहेगा या आश्वासनों के बयान? और क्या कभी ऐसा दिन आएगा जब जनहित सचमुच ‘जन’ से शुरू होगा और ‘हित’ पर खत्म होगा। बीच में कोई ‘कट’ नहीं होगा? जब तक यह नहीं होगा, तब तक हर शहर, हर कस्बे, हर गांव में भौंकने की आवाज गूंजती रहेगी। फर्क बस इतना होगा… कुत्ते अपनी प्रकृति से भौंकेंगे और व्यवस्था अपनी।
Published on:
18 Feb 2026 05:30 pm
