17 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

अमरीकी बात: फिर ढाक के तीन पात

उनके बयानों को देखकर ऐसा लगता है कि अमरीका अब भी पाकिस्तान को लेकर असमंजस में ही फंसा हुआ है

3 min read
Google source verification

image

Sunil Sharma

Oct 28, 2017

Rex Tillerson

rex tillerson

- प्रो.संजय भारद्वाज, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार

पीएमएल (एन) का तो यहां तक प्रयास है कि इस काश्गर से ग्वादर बंदरगाह तक के आर्थिक गलियारे को पंजाब तक बढ़ाया जाए। लेकिन, पाकिस्तान सेना ऐसा नहीं चाहती। वह इस आर्थिक गलियारे को रणनीतिक महत्व की दृष्टि से ही देखती है और इसीलिए उसके नवाज शरीफ के बीच टकराव की स्थिति बनी है।

अमरीका के विदेश मंत्री रेक्स टिलर्सन हाल ही भारत यात्रा पर आए। इससे पूर्व वे पाकिस्तान भी गए। उनकी यह यात्रा एशिया और खासतौर पर दक्षिण एशियाई रणनीति के पुनर्गठन के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए थी। लेकिन, उनके बयानों को देखकर ऐसा लगता है कि अमरीका अब भी पाकिस्तान को लेकर असमंजस में ही फंसा हुआ है। वह दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहता है। चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ती रणनीतिक व आर्थिक साझेदारी से भी वह चिंतित है। इस मामले में वह भारत के माध्यम से चीन को संतुलित करना चाहता है। लेकिन जब-जब भारत, पाकिस्तान को आतंकवाद की आश्रयस्थली बताकर उसका ध्यान आकर्षित करता है तो वह आतंक के खिलाफ लडऩे की बात तो करता है पर पाकिस्तान का दामन छोडऩा भी नहीं चाहता।

भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने रेक्स टिलर्सन की मौजूदगी में पाकिस्तान को जमकर खरी-खोटी सुनाई और उन्हें आतंक को शह देने में पाकिस्तान की भी भूमिका बताई। इस पर टिलर्सन ने आतंक से लडऩे में भारत का साथ देने की बात तो कही पर पाकिस्तान को कोई कड़ा संदेश वे नहीं दे पाए। इसके विपरीत उन्होंने पाकिस्तान यह बयान दिया कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में अमरीकी हितों के लिए पाकिस्तान उसके लिए महत्वपूर्ण है। और, उसके साथ अमरीकी साझेदारी बरकरार रहेगी। गौरतलब है कि अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अगस्त 2017 अपने भाषण में अमरीकन आर्मी को संबोधित करते हुए तीन महत्वपूर्ण बातें कही थीं।

पहली, पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक व सामरिक सहायता, अमरीकी हितों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं हो सकती। दूसरी, पाकिस्तान आतंक व आतंकी संगठनों के लिए सुरक्षित पनाहगाह नहीं हो सकता। तीसरी, भारत को अफगानिस्तान में अपनी अधिक साझेदारी निभानी चाहिए। ऐसा लगा कि टिलर्सन राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा कही इन बातों की लीपापोती ही कर रहे थे। इसी किस्म का बयान अक्टूबर में ही अमरीका के सुरक्षा सचिव मैटिस ने भी दिया था। उन्होंने तो पाकिस्तान के गुनाहों को लगभग माफ करते कहा, ‘वी विल वर्क वन मोर टाइम विद पाकिस्तान’।

इसका अर्थ यह है कि अमरीका पाकिस्तान पर एक बार फिर विश्वास करते हुए क्षेत्र में उसके साथ काम करते रहने का इच्छुक है। यह सब तब है जबकि वर्षों से अमरीका की सहायता से आगे बढ़ता रहा पाकिस्तान अब अमरीका को ही आंखे तरेर रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी ने तो इन्हीं दिनों अमरीका को नसीहत दे डाली। उन्होंने यहां तक कह दिया कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ काफी कुछ कर चुका है और अब अमरीका सहित अन्य देशों को भी करना चाहिए। उन्होंने तो यह भी कहा कि पाकिस्तान के लिए अब अमरीका पर निर्भरता के दिन खत्म हो गए हैं।

उनके ऐसा कहने के पीछे पाकिस्तान की यह समझ जरूर है कि अमरीका उसे केवल धमकियां ही दे सकता है और यदि उसे पाकिस्तान के फाटा क्षेत्र में तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के आतंकियों से लडऩा है तो पाकिस्तान की सहायता लेनी ही पड़ेगी। कड़ी कार्रवाई और युद्धक सामग्री अफगानिस्तान तक पहुंचाने के लिए पाकिस्तान की मदद लेनी ही होगी। इसके अलावा शाहीद अब्बासी की घरेलू राजनीतिक मजबूरी भी है। वे पिछले दिनों हटाए गए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के विश्वासपात्र हैं। नवाज शरीफ के राजनीतिक दल पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) को अगला चुनाव 2018 मे लडऩा है और वह कमजोर स्थिति में जनता के सामने नहीं जा सकती।

अब्बासी को नवाज शरीफ के परिवार से किसी अन्य के खासतौर पर उनकी बेटी के भी प्रधानमंत्री बनने से भी कोई एतराज नहीं है। वे जताना चाहते हैं कि उनकी पार्टी की सरकार अमरीका के साथ घेराबंदी कर रहे भारत से नहीं डरती बल्कि दिखाना चाहते हैं कि पाकिस्तान की वर्तमान सरकार घुटने टेक देने वाली नहीं है। यह भी स्पष्ट है कि वे और उनकी पार्टी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की प्रबल पक्षधर है और उसे व्यापारिक लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानती है। पीएमएल (एन) का तो यहां तक प्रयास है कि इस काश्गर से ग्वादर बंदरगाह तक के आर्थिक गलियारे को पंजाब तक बढ़ाया जाए। लेकिन, पाकिस्तान में सेना ऐसा नहीं चाहती।

वह इस आर्थिक गलियारे को रणनीतिक महत्व की दृष्टि से ही देखती है और इसीलिए उसके नवाज शरीफ के बीच टकराव की स्थिति बनी है। फिलहाल, पीएमएल (एन) सैन्य प्रशासन के साथ राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई भी घरेलू स्तर पर लड़ रही है। चूंकि वर्तमान पीएमएल (एन) सरकार आर्थिक गलियारे को व्यापारिक अवसर के तौर पर देखती है इसीलिए वह नहीं चाहती कि अमरीका इस मामले में किसी प्रकार का दखल दे। वह यह भी नहीं चाहती कि अफगानिस्तान में शांति को लेकर अमरीका भारत को उकसाए नही। इसके विपरीत वह तो यह चाहती है कि कश्मीर मामले पर अमरीका उसका समर्थन भी करता रहे। उसकी हालिया बयानबाजी के पीछे यही वजह रहीं हैं पर ये बयानबाजी दर्शा रही हैं भारत टिलर्सन की यात्रा से पाकिस्तान पर दबाव बनाने में नाकामयाब रहा है। इसका हमें विशेष लाभ नहीं मिल पाया।