
आपकी बात, क्या समाज और परिवार में बुजुर्गों की उपेक्षा हो रही है?
जरूरी है सामंजस्य
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में व्यक्ति अपने लिए ही दो पल नहीं निकाल पाता, तो अन्य जिम्मेदारियां कैसे पूरी करे। यही सोच उसके व्यवहार और विचारों में शुष्कता लाती है। युवाओं को भी समय प्रबंधन थोड़ा ठीक करना होगा और अपने बुजुर्गों को सम्मान देना होगा। आखिर वे आज जो कुछ भी हैं, अपने बुजुर्गों के कारण ही हैं। साथ ही बुजुर्गों को भी समय और परिस्थितियों को देखते हुए बच्चों के विषय में सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए, जिससे आपसी सामंजस्य बना रहे।
-नरेंद्र रलिया, भोपालगढ़़, जोधपुर
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बुजुर्गों की उपेक्षा
वाकई समाज एवं परिवार में बुजुर्गों की उपेक्षा हो रही है। बच्चे अपने माता-पिता, दादा-दादी को साथ रखना नहीं चाहते। वे उन्हें वृद्धाश्रम में छोडऩा ज्यादा पसंद करते हैं।
-डा. अशोक, पटना (बिहार)
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मजबूर हैं बुजुर्ग
समाज और परिवार में बुजुर्ग उपेक्षित हैं। जिल्लत भरी जिंदगी जी रहे हैं। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। बच्चे वृद्धों की देखभाल करने की बजाय उन्हें इन आश्रमों में भेज देते हैं, या उन्हें इतना परेशान किया जाता है कि वे स्वयं जाने को मजबूर हो जाते हैं ।
-अर्विना, ग्रेटर नोएडा
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दो बोल के लिए भी तरसे
परिवार व समाज में बुजुर्गों की अहमियत चरण-स्पर्श तक सीमित रह गई है। अपने महत्त्वपूर्ण निर्णय व वार्तालाप में उन्हें सम्मिलित न कर अनचाहे ही हम उन्हें उपेक्षा की ओर धकेल रहे हैं। आभासी दुनिया के मकडज़ाल में हम इस कदर लिप्त हो गए हैं कि कई बार दो बोल के लिए तरसती बूढ़ी आंखों को भी नजरअंदाज कर देते है।
-सरस्वती जैन, हुबली
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समझना होगा युवाओं को
समाज और परिवार में बुजुर्गों की उपेक्षा का सबसे बड़ा कारण आज की युवा पीढ़ी को जरा भी दखलंदाजी पसंद नहीं होना है। बुजुर्ग बरगद के वृक्ष समान हैं, जो फल भले न देते हों, किन्तु छाया अवश्य देते हैं। युवाओं को यही समझना चाहिए और उन्हें आदर से रखना चाहिए। उनकी उपेक्षा की वजह से अधिकांश घरों में अशान्ति रहती है ।
-विद्या भंडारी
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अमर्यादित हो रही है युवा पीढ़ी
आजकल एकाकी जीवन शैली व्यतीत करने की प्रवृत्ति ने बुजुर्गों की उपेक्षा को बढ़ावा दिया है। बुजुर्ग समाज और परिवार की रीढ़ हैं। जिस प्रकार शरीर रीढ़़ के बिना सही रूप से संचालित नहीं हो सकता, उसी प्रकार समाज और परिवार भी बिना बुजुर्गों के अधूरे हैं। परिवारों में विघटन, अशांति और अकेलापन इसी का परिणाम है। बुजुर्गों की उपेक्षा से नई पीढ़ी संस्कारित होने की बजाय अमर्यादित हो रही है।
-श्याम सुन्दर श्रीवास्तव, भिण्ड (म.प्र.)
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परिवार हो रहे हैं कमजोर
भारतीय परिप्रेक्ष्य में वरिष्ठ नागरिकों की दशा चिन्तनीय है। दादा-दादी, नाना-नानी की यह पीढ़ी एक जमाने में भारतीय परंपरा और परिवेश में अतिरिक्त सम्मान की अधिकारी हुआ करती थी। उसकी छत्रछाया में संपूर्ण पारिवारिक परिवेश निश्चिंत और भरापूरा महसूस करता था। आज वृद्धों को निरर्थक और अनुपयोगी समझा जा रहा है। वृद्धों की उपेक्षा से परिवार तो कमजोर हो ही रहे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा नई पीढ़ी प्रभावित हो रही है।
-शशांक गर्ग, किशनगढ़ बास, अलवर, राजस्थान
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परिवार में उपेक्षित
संयुक्त परिवारों के विघटन का दुष्परिणाम बुजुर्गों की निरंतर होती उपेक्षा के रूप में सामने आ रहा है। प्राचीन समय में संयुक्त परिवार में मुखिया का बड़ा प्रभाव रहता था और सभी लोग उनका आदर और सम्मान करते थे। एकल परिवारों में अब हर एक सदस्य की अपनी व्यस्तता है। बच्चे पढ़ाई के लिए तथा बाद में नौकरी के लिए बड़े शहरों में या विदेश में रहने लग जाते हैं। बुजुर्ग उनके साथ रहें, यह उन्हें स्वतंत्रता में खलल लगता है और वे सामंजस्य नहीं बिठा पाते। परिवार में उपेक्षित होने पर बुजुर्ग कुण्ठित होने लगते हैं।
-भारती जैन, जयपुर
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बुजुर्गों का ध्यान
जिन नवयुवाओं में अच्छे संस्कार बाकी हैं, वे अब भी अपने बड़े-बुजुर्गों का ख्याल रखते हैं। फिर भी ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे, जहां बुजुर्गों को बेकार सामान की तरह मानकर उन्हें बेकद्री से छोड़ दिया जाता है।
-शैलेंद्र गुनगुना, झालावाड़
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बिगड़ रहे हैं हालात
अपवाद स्वरूप कुछ लोगों को छोड़कर बुजुर्गों की उनके बेटे-बहू ही पूछ-परख नहीं करते। तभी तो यह स्थिति बनती है।
-हेमा हरि उपाध्याय, उज्जैन (म.प्र.)
Published on:
02 Feb 2021 05:32 pm
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