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शुल्कों की राजनीति में फंसे भारत-अमरीका संबंध?

राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भारत को यह स्मरण कराने की कोशिश की है कि यदि वह रूस से कच्चे तेल की खरीद के प्रश्न पर वाशिंगटन की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं चला तो शुल्कों का शिकंजा और कस दिया जाएगा।

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जयपुर

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Opinion Desk

Jan 07, 2026

-विनय कौड़ा, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार

अमरीकी सत्ता के गलियारों से एक बार फिर वही स्वर उभरा है जिसमें संवाद की शालीनता कम और चेतावनी का खुरदरापन अधिक है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भारत को यह स्मरण कराने की कोशिश की है कि यदि वह रूस से कच्चे तेल की खरीद के प्रश्न पर वाशिंगटन की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं चला तो शुल्कों का शिकंजा और कस दिया जाएगा। यह वक्तव्य किसी क्षणिक आवेग या चुनावी बयानबाजी का परिणाम नहीं, बल्कि उस राजनीति की निरंतरता है जिसमें व्यापार को दबाव और दंड का उपकरण बना दिया गया है। यह वही दृष्टि है जिसमें राष्ट्रों की संप्रभुता को एक असुविधाजनक तथ्य मान लिया गया है और मित्रता को आज्ञाकारिता की कसौटी पर परखने की कोशिश की जा रही है।

विडंबना यह है कि यह चेतावनी उस समय दी जा रही है जब भारतीय निर्यात पहले से ही अमरीकी बाजार में अभूतपूर्व शुल्क-भार झेल रहे हैं। कई प्रमुख क्षेत्रों जैसे इस्पात, एल्युमिनियम, रसायन, वस्त्र और आइटी सेवाओं में प्रभावी शुल्क दरें 40 से 50 प्रतिशत तक पहुंच चुकी हैं। यह बोझ किसी व्यापारिक असंतुलन का स्वाभाविक परिणाम नहीं बल्कि एक राजनीतिक असंतोष का आर्थिक दंड है। इन शुल्कों का एक बड़ा हिस्सा भारत की रूसी तेल-नीति से जोड़कर थोपा गया है। ट्रंप का यह कथन कि 'अमरीका बहुत जल्द शुल्क बढ़ा सकता है और यह भारत के लिए बहुत बुरा होगा' उस भाषा का उदाहरण है जिसमें बराबरी के भाव की बजाय आधिपत्य का दंभ स्पष्ट झलकता है। यह कूटनीति नहीं बल्कि व्यक्तिगत संतोष और घरेलू राजनीतिक संदेशों को विदेश नीति का मानक बनाने की प्रवृत्ति है। ऐसी प्रवृत्ति वैश्विक विश्वास को कमजोर करती है और साझेदारी की अवधारणा को मात्र लेन-देन तक सीमित कर देती है। तथ्य इस पूरे विमर्श को एक भिन्न रोशनी में रखते हैं।

भारत ने पिछले एक वर्ष के दौरान अपनी तेल-आयात संरचना में उल्लेखनीय परिवर्तन किया है। कुल कच्चे तेल का आयात बढ़ा है किंतु रूस से आने वाले तेल की हिस्सेदारी धीरे-धीरे घटी है। इसके समानांतर अमरीका, पश्चिम एशिया और अफ्रीकी देशों से आयात में वृद्धि हुई है। विशेष रूप से अमरीका से एलएनजी और कच्चे तेल की खरीद में दोहरे अंकों की वृद्धि दर्ज की गई है। यह वृद्धि केवल सांकेतिक नहीं बल्कि दीर्घकालिक आपूर्ति अनुबंधों और बंदरगाह-आधारित अवसंरचना निवेश के रूप में ठोस आंकड़ों में दर्ज है। ऐसे में यह कहना कि भारत ने अमरीकी अपेक्षाओं को पूरी तरह अनदेखा किया है, सत्य के साथ अन्याय के समान है। इसके बावजूद दबाव कम नहीं हो रहा। इसका कारण तेल की वास्तविक मात्रा नहीं बल्कि वह सिद्धांत है जिसे भारत छोडऩे को तैयार नहीं- अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार। रूस से तेल खरीदना भारत के लिए किसी वैचारिक झुकाव या भू-राजनीतिक पक्षधरता का प्रतीक नहीं बल्कि व्यावहारिक ऊर्जा-सुरक्षा का प्रश्न रहा है।

एक ऐसा देश जिसकी विशाल आबादी, बढ़ती औद्योगिक आवश्यकताएं और महत्वाकांक्षी विकास-लक्ष्य हैं, वह अपनी ऊर्जा आपूर्ति को किसी एक स्रोत या किसी एक राजनीतिक खेमे के भरोसे नहीं छोड़ सकता। यही कारण है कि भारत ने संतुलन की नीति अपनाई हैै। जहां संभव हुआ, विकल्प बढ़ाए हैं और जहां आवश्यक हुआ, वहां जोखिम कम किए हैं। अमरीकी प्रतिबंधों के बाद भारत की प्रमुख सार्वजनिक और निजी रिफाइनरियों ने स्वयं कई रूसी आपूर्तिकर्ताओं से दूरी बनाई है। भुगतान तंत्र बदले गए, बीमा जोखिमों का पुनर्मूल्यांकन हुआ और शिपिंग मार्गों में संशोधन किया गया। इसके बावजूद अमरीकी कांग्रेस में द्वितीयक शुल्कों और प्रतिबंधों की चर्चा यह स्पष्ट करती है कि ट्रंप प्रशासन की अपेक्षाएं यहीं समाप्त नहीं होंगी। यूक्रेन युद्ध की आड़ में उन देशों को दंडित करने की तैयारी जिनका उस संघर्ष में कोई प्रत्यक्ष सैन्य या राजनीतिक दायित्व नहीं, वैश्विक व्यवस्था की नैतिक नींव को कमजोर करती है और अंतरराष्ट्रीय कानून के चयनात्मक प्रयोग को उजागर करती है। यहां तुलना अनिवार्य हो जाती है। चीन, जो रूस से भारत की तुलना में कहीं अधिक तेल और गैस खरीद रहा है, अमरीकी दबाव से लगभग अछूता है। इसका कारण स्पष्ट है- रणनीतिक भय, आर्थिक परस्पर-निर्भरता और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में चीन की केंद्रीय भूमिका।

भारत के मामले में यह भय नहीं, बल्कि यह अपेक्षा दिखाई देती है कि वह बिना शोर किए अमरीकी दबाव के समक्ष झुक जाएगा। यही वह दोहरा मानदंड है जो इस पूरे प्रकरण को केवल व्यापारिक नहीं बल्कि राजनीतिक और व्यक्तिगत तुनकमिजाजी का उदाहरण बनाता है। सबसे बड़ी आशंका यही है कि भारत द्वारा दी गई रियायतें अमरीकी दबाव को कम नहीं करेंगी, बल्कि नई मांगों को जन्म देंगी। आज प्रश्न रूसी तेल का है तो कल कृषि सब्सिडी का होगा फिर डिजिटल कर, डेटा स्थानीयकरण और दवा उद्योग की नीतियां निशाने पर होंगी। यह एक ऐसी शृंखला है जिसका कोई अंतिम बिंदु नहीं। यह भी समझना आवश्यक है कि वर्तमान अमरीकी विदेश नीति किसी स्थायी सिद्धांत का प्रतिनिधित्व नहीं करती। यह एक विशेष राजनीतिक दौर, घरेलू धु्रवीकरण और 'अमरीका फस्र्ट' के संकुचित दृष्टिकोण की उपज है जो भविष्य में बदल भी सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत को संवाद से इनकार करना चाहिए। संवाद आवश्यक है, पर वह आत्मविश्वास और स्पष्टता के साथ होना चाहिए। यदि किसी बिंदु पर ऊर्जा-नीति में परिवर्तन आवश्यक हो तो वह भारतीय आवश्यकताओं, बाजार स्थितियों और दीर्घकालिक हितों के आधार पर हो, न कि किसी धमकी की प्रतिक्रिया में। यह क्षण भारत के लिए आत्ममंथन का हैै।