
क्या भारत में बुजुर्गों की उपेक्षा हो रही है?
तन, मन और धन से मजबूत रहें
यह सत्य है कि आज भारत में बुजुर्गों की उपेक्षा हो रही है। इसके लिए कई कारण हैं। बढ़ती हुई महंगाई, पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण, संसाधनों की कमी, संकुचित विचारधारा आदि आदि। आज की पीढ़ी बुजुर्गों के त्याग को समझना ही नहीं चाहती। बुढ़ापे में बुजुर्गों की दवाइयां और दूसरी जरूरतों का खर्च बहुत ज्यादा लगने लगता है। जिन बुजुर्गों को पेंशन मिलती है, उनको तो संभाल लिया जाता है, लेकिन ज्यादातर बुजुर्ग बोझ लगने लगते हैं। इसलिए बुजुर्गों ने तन, मन और धन से कभी पंगु नहीं होना चाहिए। यही उपेक्षा के दर्द से बचने को रामबाण उपाय है। पैसा हाथ में रहना अनिवार्य है। बुढ़ापे के लिए ऐसी व्यवस्था जरूर करें कि पैसा नियमित रूप से आए। जब पैसा होगा तो वे बच्चों को दे सकेंगे जिससे उनकी तरफ परिवार का ध्यान रहेगा। साथ ही बुजुर्गों को भी बदलते वक्त का ध्यान रखना चाहिए। आज की पीढ़ी की अपनी अपनी कठिनाइयां हैं, जिससे वे जूझ रही हैं। जीवनयापन अब बहुत कठिन हो गया है। बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्धा है, जिससे नई पीढ़ी हर क्षण परेशान रहती है। वस्तुस्थिति को ध्यान में रखना सबके लिए जरूरी है।
-राजेन्द्र कुमार सुराणा, रायपुर
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एक दिन तो सभी वृद्ध होंगे
वृद्धजनों की उपेक्षा का अर्थ है जीवन में विविध ज्ञान और अनुभवों का अभाव। वृद्धावस्था को भार समझने का मतलब है शरीर धारण को ही भार मानना। वृद्ध साक्षात देवता हैं। हमारी सभ्यता और संस्कृति की धरोहर व समाज का मेरुदंड है। इनको सम्मान देने एवं उनकी सेवा करने से आय, शिक्षा, यश, बल और आशीर्वाद मिलता है,मार्गदर्शन मिलता है। इनका आदर व सेवा हमारा कर्तव्य ही नहीं, जिम्मेदारी है, मगर आज पाश्चात्य संस्कृति और अपनी संकीर्ण मानसिकता के कारण जो लोग वृद्धजनों की उपेक्षा कर रहे हैं, वे भी आखिर एक दिन वृद्ध होंगे, तब उनके साथ भी वही व्यवहार होगा, जिसकी वे आज नींव डाल रहे हैं।
-पारस रूहानी, जयपुर
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दुर्व्यवहार के शिकार बुजुर्ग
गैर सरकारी संगठन के सर्वे में बताया गया है कि दूसरी लहर के मद्देनजर लगे लॉकडाउन के दौरान 73 प्रतिशत बुजुर्ग दुर्व्यवहार के शिकार हुए। करीब 35 प्रतिशत वरिष्ठ नागरिकों को तो घरेलू हिंसा सहनी पड़ी। इसमें महिलाओं की तादाद ज्यादा है। सभ्य समाज का तकाजा है कि बुजुर्गों के अनुभवों को न सिर्फ आत्मसात किया जाए, बल्कि उन्हें अपने नएपन के साथ आगे भी बढ़ाया जाए। बुजुर्गों को सम्मान मिलना चाहिए।
-डॉ. विकास पंडित, सेंधवा, बड़वानी, मप्र
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जहां बुजुर्ग सुखी न हों, वहां देवता भी प्रसन्न नहीं होते
आधुनिकता के दौर में लोग इतने आगे निकल चुके कि लोगों में अपनत्व की भावना खत्म होती जा रही ह। बुजुर्गों की उपेक्षा हो रही है। अब स्वयं हमें भी यह समझना चाहिए कि बुजुर्ग हमसे ज्यादा कुछ सुविधाएं नहीं चाहते, वे बस हमसे थोड़े सम्मान और प्रेम की अपेक्षा रखते हैं। जिन बुजुर्गों ने संतानों के सुख के लिए अपना पूरा जीवन परिश्रम तथा संघर्ष करते हुए बिता दिया, अब जीवन की वृद्धावस्था में उनकी उपेक्षा करना कानूनी भी सही नहीं है। जिस परिवार में बुजुर्ग सुखी नहीं होते, वहां देवता भी प्रसन्न नहीं होते।
-शुभम् दुबे, इंदौर, मप्र
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संवेदनशीलता का अभाव
भारत में भी दिन-प्रतिदिन हमारे बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा निरंतर बढ़ती जा रही है, जो संवेदनशीलता का अभाव प्रदर्शित कर रही है। आज हम पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव में अपनी सांस्कृतिक परंपरागत और विरासत में मिली धरोहरों को नष्ट कर रहे हैं। हमारे रीति-रिवाज और सभ्यता ने ही हमें संसार में विश्व गुरु की उपाधि प्रदान की थी। अमूल्य संस्कार और आचार-विचार की अवहेलना कर हम स्वयं अपना ही नुकसान कर रहे हैं। आज जीवन में बढ़ता अवसाद, बढ़ते तलाक, बच्चों के सर्वांगीण विकास में बाधा जैसी समस्याओं की वजह बुजुर्गों की उपेक्षा है। आज देश में बढ़ते वृद्धाश्रम इस बात का जीता जागता उदाहरण है कि हम स्व केंद्रित हो गए हैं। भूल गए हैं कि हम भी कभी बुजुर्ग होंगे, हमें अपनी उपभोक्तावादी तथा अहंकार प्रवृत्ति को नष्ट कर अपने संस्कारों को पुनर्जीवित करना होगा। साथ ही बुजुर्गों को भी कुछ संतुलन के साथ परिवार के बच्चों को संस्कारित करने का कर्तव्य निभाना चाहिए।
-एकता शर्मा, गरियाबंद, छत्तीसगढ़
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अनुभव का फायदा उठाएं
भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों को बहुत ही सम्मानीय स्थान दिया गया है, परन्तु आज के भौतिकवादी युग एवं एकल परिवार की धारणा के कारण भारत जैसे देश में बुजुर्गों की दुर्दशा हो रही है। जिन बुजुर्गों के कारण हमने विकास किया है, उन्हीं बुजुर्गों को हम अपने पास तक नहीं रखना चाहते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह पड़ाव हमारी जिंदगी में भी आएगा। जो हम देंगे, वही लौटकर आएगा। हम प्यार देंगे, तो प्यार मिलेगा और यदि नफरत देंगे, तो हमें भी नफरत ही मिलेगी। मुश्किल यह है कि आजकल लोग बेटा तो श्रवण कुमार जैसा चाहते हैं, परन्तु जंवाई श्रवण कुमार नहीं होना चाहिए। ऐसा कैसे हो सकता है? बुजुर्ग यदि पढ़े-लिखे भी नहीं है, तो भी उनके पास अनुभव का खजाना है, जिसका फायदा उठाना चाहिए।
कैलाश चन्द्र मोदी, सादुलपुर, चूरू
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शिक्षा के साथ संस्कार भी दें
लोग अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा तो दे रहे हैं लेकिन अच्छे संस्कार नहीं। संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं, जिसका प्रमुख कारण है अपनी संस्कृति को भूल पाश्चात्य संस्कृति की ओर अग्रसर होना। अत: हमें चाहिए कि बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार भी दिए जाएं।
-सचिन सनाढ्य, बारां
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एकल परिवारों के कारण बढ़ी समस्या
बुजुर्गों की उपेक्षा का मुख्य कारण है संयुक्त परिवार का विघटन और एकल परिवार का चलन। भारतीय समाज में दिन प्रतिदिन घटती मानवीय भावनाएं और बढ़ती आवश्यकताएं भी बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा का कारण हैं। रिश्तों के प्रति संवेदनशीलता के अभाव ने जब एकल परिवार को भी तोड़ऩा आरम्भ कर दिया है, तो घर के बुजुर्गों की उपेक्षा तो लाजमी है। बढ़ती महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी जैसी समस्याएं भी बुजुर्गों की उपेक्षा का कारण बन रही है।
- मुकेश भटनागर भिलाई, छत्तीसगढ़
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वृद्धाश्रमों में वृद्धि
वर्तमान में लोगों की असंतुलित जिंदगी यह सिद्ध करती है कि बुजुर्गों व उनके अनुभवों की उपेक्षा की जा रही है। बदलते परिवेश में अनुकूलित ना हो पाने के कारण बुजुर्ग या तो वृद्धाश्रमों की ओर उन्मुख हो रहे हैं या फिर किए जा रहे हैं। अनुभव के इस अथाह खजाने की उपेक्षा युवा पीढ़ी को असंतुलित जीवन प्रदान कर रही है। भारत जैसे सभ्य और सांस्कृतिक देश बुजुर्गों की उपेक्षा चिंताजनक है।
-मनोज जैन, टोंक
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बढ़ रही है संवेदनहीनता
परिवार में बुजुर्ग तो उसे वट वृक्ष के समान हैं, जो स्वयं तपन को सहकर अपने आश्रय में आने वाले लोगों को शीतल छाया देता है। परिवारों में संवेदनहीनता बढ़ती जा रही है। अब परिवार के बुजुर्गों के पास बैठने का किसी के पास कोई वक्त नहीं है। एक समय के बाद कई बुजुर्ग अशक्त हो जाते हैं। परिवार के सदस्य उनको बोझ समझने लगते हैं। इस बात को समझना चाहिए कि बुजुर्गों के आशीष एवं सद्भावना से ही परिवार खुशहाल रहता है। इसलिए हर परिवार में बुजुर्गों का सम्मान होना चाहिए।
-सतीश उपाध्याय, मनेंद्रगढ़ कोरिया, छत्तीसगढ़
हर जगह उपेक्षा
भारत मे लगभग 10 प्रतिशत जनसंख्या बुजुर्गों की है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन बच्चों के लालन-पालन में लगा दिया। आज बच्चों के पास बुजुर्गों से बात करने, उनके पास बैठने और उनका इलाज कराने का समय नहीं है। बुजुर्गों को अस्पताल, बस अड्डे, सड़क, बाजार, पार्क ही नहीं घर पर भी उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है। यह हमारे संस्कारों में आई कमी, भौतिकवादी दृष्टिकोण और एकल परिवार की वजह से है।
डॉ. प्रभु सिंह झोटवाड़ा, जयपुर
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भारतीय संस्कृति को अपनाएं
पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से भारत में भी संयुक्त परिवार का स्थान एकल परिवार लेते जा रहे हैं। इन परिवारों में दादा-दादी का स्थान नहीं है। उन्हें या तो वृद्धाश्रम में डाल दिया जाता है या फिर घर के किसी कोने में उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है । भारत सरकार को बुजुर्गों की देखभाल के लिए सख्त कदम उठाने होंगे। साथ ही आज की पीढ़ी को भी सोचना होगा कि कल वे भी वृद्ध होंगे। वृद्ध की सेवा व उपस्थिति से ही परिवार की पूर्णता है। यही सच्ची भारतीय संस्कृति है, इसे अपनाना चाहिए।
-पूरन सिंह राजावत, जयपुर
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वृद्धाश्रमों की कमी
परिवार के आधार स्तंभ हमारे बुर्जुगों की स्थिति आज दयनीय सी हो गई है। उनका जीवन यापन बहुत ही कठिन होता जा रहा है। कोई चलने में असमर्थ, तो कोई बेड को ही अपनी नियति मानकर जीवन निर्वाह कर रहा है। असहाय बुजुर्गों का शेष जीवन कष्ट और उपेक्षा की मार झेल कर बीत रहा है। स्थिति ऐसी हो गई है कि बुजुर्ग घर की दहलीज पर टकटकी लगाए रहते हैं कि कोई आए, तो दो-चार बातें कर लें। बुजुर्ग की स्थिति अत्यंत ही दारुण है। सरकार ने वृद्धाश्रम खोल तो रखे है , लेकिन ये पर्याप्त नहीं है । बुजुर्गों को दया की नहीं, परिवार के साथ की महती आवश्यकता है।
-डॉ. अजिता शर्मा, उदयपुर
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जरूरी है संवाद
परिवार में बुजुर्गों का होना ईश्वर का आशीर्वाद है। उनका अनुभव सदैव परिवार के हित में काम आता है और परिवार संरक्षित व संगठित रहता है। जरूरत बस इस बात की है कि परिवार के सदस्य बुजुर्गों के इस अनुभव को साझा करें और उनके मार्गदर्शन को स्वीकार कर आगे बढं़े। इससे बुजुर्गों का मान सम्मान भी बना रहेगा और हमारा भी मार्ग प्रशस्त व निष्कंटक होगा। घर के सदस्यों में संवाद की कमी होने से बुजुर्ग स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं। संवाद की कमी के कारण ही उम्र के अंतर का वैचारिक मतभेद भी सामने आने लगता हैं। ऐसे में परिवार के सदस्यों का दायित्व है कि अपने काम के साथ-साथ समय निकालकर कुछ समय घर के बुजुर्गों के लिए भी निकालें और उनके मन की बातों को भी सुनें। घर में बुजुर्गों के प्रति सकारात्मक संवाद बुजुर्गों को अपनी उपेक्षा के बोध से दूर रखेगा।
-सुदर्शन शर्मा, चौमूं, जयपुर
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विदेश का मोह घातक
आज समाज में उन बुजुर्गों की ज्यादा उपेक्षा हो रही है, जो अपनी महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए बच्चों को विदेश जाने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि एक बार विदेश का रुख करने वाला उनका बच्चा वापस स्वदेश आने वाला नहीं है। मां-बाप इनके साथ विदेश में नहींं रह सकते। इस तरह ये अभिभावक बुजुर्ग अवस्था में लाचारी का जीवन जीने पर विवश हो जाते है।
-अशोक कुमार जैन, कोटा
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तीर्थ के समान हैं बुजुर्ग
आज स्वच्छंदता पूर्ण जीवन की अभिलाषा और एकल परिवार की अवधारणा ने हमारी सामाजिक संस्कृति की जड़ों को खोखला कर दिया, जिसमें सबसे बड़ी हानि हमारे बुजुर्गों को उठानी पड़ी है। यह बात समझनी होगी कि बुजुर्ग वट वृक्ष की तरह होते हैं, जिनकी छाया में सभी आनंद की अनुभूति महसूस करते हैं। जीवन को पूर्ण सामर्थ्य से जीने के लिए हमें अपने बुजुर्गों का आशीर्वाद अति आवश्यक है। हमें समझना होगा एक दिन हम भी उसी अवस्था में पहुंचेंगे, जहां आज वे हैं। उनकी उपेक्षा स्वयं ईश्वर की उपेक्षा के समान है। हमारी संस्कृति में भी उन्हें तीर्थ स्थान के समान आदर दिया गया है। अत: उनका सम्मान हमारा कर्तव्य ही नहीं दायित्व भी बनता है।
-सिद्धार्थ शर्मा, गरियाबंद, छत्तीसगढ़
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भार मानते हैं बुजुर्गों को
आज हमारे समाज में बुजुर्ग माता-पिता की उपेक्षा एक आम बात हो चुकी है। आज भारत की सनातन संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव देखने को मिल रहा है, जिसके कारण बुजुर्गों को उनकी संतानें एक भार स्वरूप मानकर उनको वृद्धाश्रम में भेज देती हैं या फिर उनको अलग-थलग कर देती हैं। हालत यह है कि माता-पिता के साथ उनके पुत्र धन के लिए मारपीट तक करते रहते हैं।
-भंवर लाल सारण, बालोतरा, बाड़मेर
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शहरों में हालात खराब
आज हमारे समाज में हमारे बुजुर्ग एकाकी रहने को विवश हैं। गावों में तो स्थिति फिर भी ठीक है, लेकिन शहरों में तो स्थिति एकदम विपरीत है। ज्यादातर बुजुर्ग घर में अकेले ही रहते हैं। जिनके बच्चे उनके साथ हैं वे भी अपने अपने कामों में इस हद तक व्यस्त हैं कि उनके पास अपने माता-पिता से बात करने के लिए समय ही नहीं है।
-प्रदीप कुमार दुबे, देवास
Published on:
16 Jun 2021 05:56 pm
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