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आत्मकथा लेखन : जो भी लिखूंगा, सच लिखूंगा

आत्मकथा लेखन की पहली शर्त खुद के प्रति ईमानदारी है।

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आत्मकथा लेखन

आत्मकथा लेखन

आत्मकथा लेखन की पहली शर्त खुद के प्रति ईमानदारी है। इसके माध्यम से लेखक अपनी जीवनगाथा ही नहीं लिखता, बल्कि उसमें नाते-रिश्तेदार, सहपाठी-सहकर्मी, शत्रु-मित्र... सभी शामिल हो जाते हैं। उनके गुण-दोष भी लिखने होंगे। द्वंद्व यह कि पूरा सच लिखें तो औरों का चरित्र उजागर हो सकता है, और अधूरा सच आत्मकथा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर सकता है। इस द्वंद्व से पार पाने के रास्ते हम आगे सुझाते रहेंगे। जीवन की किताब लिखने के लिए पांच मददगार प्रश्न और...। प्रश्नों की डायरी में इन्हें भी शामिल कर लीजिए।

जीवन के शुरुआती वर्ष-3

11. कोई मूल्यवान सीख, जो शुरुआती दिनों में मिली।
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12. घर, पड़ोस, पहली साइकिल-स्कूटर-कार से जुड़ी यादें।
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13. ऐसी कोई आदत, विशेषता जो मुझमें थी। जिसने मुझे बनाया, बिगाड़ा या संवारा।
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14. परिवार के खाने के तौर-तरीके?
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15. त्योहारों से जुड़े किस्से-यादें। किस तरह मनाते थे पर्व?
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'आत्मकथा लेखन हुआ सरल'
हर व्यक्ति की कामना होती है कि उसके जीवन की यादें वर्तमान व भविष्य की पीढिय़ों में जिंदा रहें। 'मेरा जीवन मेरी किताब' ने मुझे नई प्रेरणा दी है। आत्मकथा के लिए मैंने वर्ष 1940-2000 का कालखंड चुना है। इस समय में हम जर्जर व्यवस्था से समृद्धि और उच्च टेक्नोलॉजी तक पहुंच गए हैं। इसका श्रेय युवाओं के साथ पुरानी पीढिय़ों की सूझ-बूझ, बचत की आदतों व बड़ों को सम्मान देने की प्रवृत्ति को जाता है।

-प्रताप सिंह चौधरी, जयपुर (राज.)

अपनी जीवनी लिखने से व्यक्ति अपनी कमियों और खूबी का मूल्यांकन कर सकता है। 'पत्रिका' ने जिस तरह से इसे प्रस्तुत किया है, उससे अपने जीवन की घटनाओं को सच्चाई से लिख कर निश्चित रूप से एक आत्मकथा को लिखा जा सकता है। इस पहल और सहयोग से आत्मकथा लिखना बहुत ही सरल हो गया है।
-दिलीप शर्मा, भोपाल (म.प्र.)