
bhu girls
- रामबहादुर राय, राजनीति विश्लेषक, पद्मश्री से सम्मानित, बनारस हिन्दू विश्वविघालय के पूर्व छात्र, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली के अध्यक्ष
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की छात्राओं ने परिसर में असामाजिक तत्वों की प्रताडऩा से तंग आकर आधी रात को आंदोलन कर दिया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे बाहरी तत्वों द्वारा राजनीतिक उकसावे की कार्रवाई बता कर पर्दा डालने की कोशश की। लेकिन, छात्राओं को क्यों करना पड़ा आंदोलन और क्या इसके पीछे की वजह कुछ और है? विश्वविद्यालय अपने आप में एक तरह से स्वायत्त राज्य होता है। विश्वविद्यालय की चारदीवारी में कुलपति का शासन चलता है। कुलपति अगर छात्राओं की सुरक्षा का प्रबंध नहीं कर सकता तो उसे एक मिनट भी पद पर बने रहने का हक नहीं है।
कोई भी आंदोलन असंतोष से पैदा होता है और उसमें घटना चिंगारी का काम करती है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में आंदोलनों का एक इतिहास रहा है। छात्रा से बदसलूकी की घटना ने चिंगारी का काम किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने के कारण उन्हें भी निशाने पर लेने की कोशिशें हैं। किसी भी विश्वविद्यालय के कुलपति को जात-पांत और क्षेत्रवाद से ऊपर होना चाहिए। साथ ही उसे छात्रों और अध्यापकों का विश्वास भी हासिल करना चाहिए। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी इस दृष्टि से विफल साबित हुए हैं। इस आंदोलन का सबसे बड़ा कारण तो यही रहा।
हर आंदोलन के पीछे एक लम्बी तैयारी होती है। यह भी सच है कि जो लोग आंदोलन की तैयारी करते हैं वे अवसर की तलाश में रहते हैं। जो लोग कुलपति से नाराज थे, उनको हटवाना चाहते थे, उन्होंने इसे अवसर के तौर पर इस्तेमाल किया। कुलपति से नाराजगी की कई वजहें है जैसे उन्होंने पदभार ग्रहण करते ही मैग्सेसे सम्मान प्राप्त डॉ.संदीप पाण्डे को उनकी गतिविधियों के आधार पर पद से हटा दिया था। डॉ. पाण्डे ने वहां पर विश्वविद्यालय ज्वाइंट एक्शन कमेटी बना रखी है। वे छात्रों और अध्यापकों में आंदोलन के लिए वातावरण बना रहे थे तथा मुद्दों की तलाश में थे। इसी तरह से जिन लोगों का असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर चयन नहीं हुआ वे भी कुलपति से नाराज हैं।
मेरा अनुभव यही कहता है कि विद्यार्थी राजनीति, अध्यापक राजनीति की धुरी पर चलती है। आज देश के तमाम विश्वविद्यालयों की राजनीति नियुक्तियों के केन्द्र में घूम रही है। अपने-अपने लोगों को प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर बनवाना अब अध्यापक संगठनों का एकमात्र उद्देश्य रह गया है। दूसरी ओर विश्वविद्यालय में एक बड़ा राजनीतिक समुदाय है छात्रों का, जो वहां लम्बे समय से छात्रसंघ की बहाली का मुद्दा उठाता रहा है। कुलपति ने छात्रसंघ को बहाल नहीं किया। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में यह हमेशा से बड़ा मुद्दा रहा है। यह ठीक है कि छात्रसंघ बन जाने के बाद कुलपति पर तरह-तरह के लोकतांत्रिक दबाव आते हैं। इससे बचने के लिए अकसर कुलपति छात्रसंघ को ही भंग कर देते हैं।
ऐसे ही कई कारण हैं इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में। कुलपति की लापरवाही और शिकायतों की उपेक्षा ने हालात और खराब कर दिए। बीएचयू में छात्र आंदोलन का लम्बा इतिहास रहा है। आजादी से पहले भी और आजादी के बाद भी। बीएचयू के संस्थापक मदन मोहन मालवीय जो कुलपति भी थे। उनके समय यह विश्वविद्यालय क्रांतिकारियों की शरणगाह बना हुआ था। स्वाधीनता सेनानी आकर हॉस्टल के कमरों में रुकते थे और अंग्रेजों की पुलिस भी परिसर में प्रवेश करने का साहस नहीं कर पाती थी। ऐसे विश्वविद्यालय में पुलिस, छात्राओं पर लाठीचार्ज करे यह तो बहुत ही शर्मनाक है। विश्वविद्यालय में अब तक हुए आंदोलनों में छात्राएं तो रहती थीं पर कम संख्या में। यह आंदोलन तो छात्राओं की अगुवाई में चल रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि असंतोष वहां पनप रहा था और उस असंतोष को संभालने या समझने का प्रयास विश्वविद्यालय के प्रशासन ने नहीं किया।
प्रधानमंत्री की वहां यात्रा होनी थी और प्रधानमंत्री को अपना रास्ता बदलना पड़ा। यह स्थिति नहीं आनी चाहिए थी लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन की अक्षमता के कारण यह हुआ। विश्वविद्यालय प्रशासन छात्राओं से संवाद बनाता और सुरक्षा का आश्वासन देता तो यह आंदोलन शुरू ही नहीं होता। हर विश्वविद्यालय में कुछ असंतोष रहता ही है पर सक्षम प्रशासन उनको अवसर नहीं देता। मैं जब बीएचयू में विद्यार्थी था तो उस समय डॉ. त्रिभुवन सैन कुलपति बनकर आए। थोड़े ही समय कुलपति रहे, बाद में वे इंदिरा गांधी की सरकार में शिक्षामंत्री बने। उन्होंने छात्रों से सीधे संवाद कर उनका विश्वास जीता। वे बिना सुरक्षा के हॉस्टलों में जाते थे। छात्रों और अध्यापकों से उनकी समस्याएं सुनते थे किंतु जब कोई पुलिसिया रवैया वाला कुलपति पहुंच जाता है तो आंदोलन की छोटी चिंगारी दावानल बन जाती है।
होना तो यह चाहिए कि बीएचयू के कुलपति को तत्काल हटा दिया जाए। तत्काल हटाएंगे तो असंतोष में कमी आएगी और विश्वविद्यालय धीरे-धीरे पटरी पर आ जाएगा। कुलपति अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। कोई भी विश्वविद्यालय अपने आप में एक तरह का स्वायत्त राज्य होता है। विश्वविद्यालय की चारदीवारी में कुलपति का शासन चलता है। कुलपति अगर छात्राओं की सुरक्षा का प्रबंध नहीं कर सकता तो उसे एक मिनट भी पद पर बने रहने का हक नहीं है।
अगर बीएचयू की छात्राएं अपनी शिकायत लेकर सडक़ पर उतर आई तो यह उनका अधिकार है। उनके अधिकारों की रक्षा करना प्रशासन का दायित्व है। लोग तब आंदोलन करते है जब उनको लगता है कि हमारी शिकायत की कोई सुनवाई नहीं हो रही। आधी रात को अगर वो अपने हक की लड़ाई लड़ रही हैं तो भारतीय लोकतंत्र के लिए यह गर्व का विषय है। इसके लिए उनकी सराहना होनी चाहिए। निहत्थी छात्राओं पर पुलिस की कार्रवाई की निंदा की जानी चाहिए। यह समूचे प्रशासन की विफलता है।

बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
