
water conservation : जल संरक्षण के लिए कारगर होगी 'ब्रेन ट्रेनिंग' की मुहिम
लेखक -:
प्रो. कंचन मुखर्जी (संगठनात्मक व्यवहार)
विवेक पीएचडी (पब्लिक पॉलिसी)
(भारतीय प्रबंधन संस्थान, बेंगलूरु)
वर्ष 2017 के उत्तराद्र्ध में दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन में लोगों को 'डे जीरो' का भय सताने लगा था, जब पहली बार ऐसा होगा कि दुनिया के किसी बड़े शहर के सारे नलों में पानी सूख जाएगा। शुक्र है ऐसा नहीं हुआ लेकिन इससे यह जरूर याद रहेगा कि विश्व में ज्यादातर शहर पेयजल आपूर्ति की समस्या से जूझ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार फिलहाल 3 बिलियन लोगों के घरों में हाथ धोने तक की सुविधा नहीं है, जो कोविड-19 से बचने के लिए एक जरूरी उपाय है। 2030 तक दुनिया में ताजे पानी की उपलब्धता, जरूरत से 40 प्रतिशत तक कम हो जाएगी। भारत जैसे विकासशील देश जल संकट की चुनौती विशेष रूप से घोषित कर चुके हैं, जहां प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता में सात दशकों में जनसंख्या बढऩे के साथ ही लगातार गिरावट आई है, खास तौर पर शहरों में। जल प्रबंधन नीति में अब तक आपूर्ति बढ़ाने पर ही जोर दिया जाता रहा है बजाय मांग कम करने के। जब संसाधन नहीं होते तो आपूर्ति नहीं हो पाती है।
तकनीकी समाधान जैसे इफिशंट वॉशबेसिन टैप, टॉयलेट फ्लश टैंक, लो-फ्लो शावर और स्मार्ट मीटर उपयोगी तो हैं, पर सहज सुलभ नहीं है और इनके लाभों पर अपव्यय का इंसानी व्यवहार भारी पड़ता है। राजनीतिक व सामाजिक अड़चनों के अलावा आपूर्ति सीमित करना या शुल्क लगाना ज्यादातर बेअसर ही रहेगा क्योंकि शहरी धनाढ्य वर्ग पानी के लिए अतिरिक्त शुल्क दे देगा, पर शावर टाइम कम नहीं करेगा। इसी के मद्देनजर बेंगलूरु के एक आवासीय समुदाय में जल संरक्षण पर हमने एक अध्ययन किया, जो हाल ही 'प्रॉसीडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका' जर्नल में प्रकाशित हुआ। क्या मानव मस्तिष्क को सिखाया जा सकता है कि पानी कम इस्तेमाल करें? क्या उपभोक्ता को उसके पानी के उपयोग के प्रति सजग किया जा सकता है? हम अपनी आदतें बदलने के लिए प्रेरित तभी हो सकते हैं, जबकि बदलाव की जरूरत के प्रति जागरूक हो जाएंगे। अगर अंदाजा ही नहीं हो कि महीने के राशन पर बहुत ज्यादा खर्च हो रहा है तो बचत के बारे में कोई कैसे सोचेगा? लोग आदत से मजबूर होते हैं। इसलिए पानी बचाओ जैसे संदेश काफी कम समय तक ही प्रभावी रहते हैं।
अध्ययन में पानी के इस्तेमाल पर आदतें बदलने व जागरूकता के लिए साप्ताहिक संदेश तैयार किए गए। इसके लिए अपार्टमेंट चार समूह में बांटे गए। कंट्रोल समूह को कोई संदेश नहीं मिला। समूह 1 को उपयोग की जानकारी के साप्ताहिक संदेश मिले। समूह 2 को साप्ताहिक उपयोग की जानकारी एवं एक लक्ष्य दिया गया (डब्ल्यूएचओ द्वारा सुझाया गया) और इसका फीडबैक मैसेज भी दिया गया। समूह 3 को उक्त संदेशों के साथ ही जल संरक्षण के सचित्र उपाय दिए गए। जैसे कम पानी से नहाना और सब्जियों को कटोरे में धोना। इससे लागों को अहसास हुआ कि वे दैनिक उपभोग के लिए कितना ज्यादा पानी खर्च कर रहे थे। लक्षित उपयोग तय करने से भी सुधार आया। अंतत: उपाय संदेशों से पानी बचाने के तरीके समझ में आए और ज्यादा सुधार आया।
अध्ययन के सह-लेखक आइआइएमबी में एसोसिएट प्रोफेसर दीपक मलघान के अनुसार, उक्त अध्ययन से जल संरक्षण गतिविधियों पर जानकारी का प्रभाव मापा जा सका। साप्ताहिक संदेश पांच सप्ताह तक ही दिए गए और प्रतिदिन का जल उपयोग तीन चरणों में मापा गया - अध्ययन से पहले, इसके दौरान और प्रयोग के बाद लगभग दो साल की अवधि तक। नतीजा, समूह 3 ने पांच सप्ताह में उपभोग 16 प्रतिशत कम कर दिया। साल भर में यह आंकड़ा 23 प्रतिशत पाया गया। अध्ययन के नतीजे संकेत हैं कि व्यवहारगत हस्तक्षेप इस दिशा में शक्तिशाली उपकरण है।
Published on:
18 Aug 2021 11:19 am
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
