ताजा मामला आइटी अधिनियम की धारा 66-ए का है। सुप्रीम कोर्ट से इस धारा को अमान्य करार दिए जाने के बावजूद विभिन्न राज्यों में इसका दुरुपयोग लगातार जारी है। 2015 में ही श्रेया सिंघल मामले में सुप्रीम कोर्ट इस कानून को खत्म कर चुका है। विचारणीय यह है कि आखिर कार्यपालिका में बैठे वे कौन लोग हैं जिन्हें शीर्ष कोर्ट की अवमानना का भय भी नहीं है।
बार-बार ऐसे उदाहरण सामने आते रहे हैं जिनसे पता चलता है कि देश की नौकरशाही अदालतों के फैसलों का पालन करने-कराने में विफल हो रही है। बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। उनकी यह विफलता देश को अपने उद्देश्य हासिल करने में भी विफल कर रही है। ताजा मामला आइटी अधिनियम की धारा 66-ए का है। सुप्रीम कोर्ट से इस धारा को अमान्य करार दिए जाने के बावजूद विभिन्न राज्यों में इसका दुरुपयोग लगातार जारी है। 2015 में ही श्रेया सिंघल मामले में सुप्रीम कोर्ट इस कानून को खत्म कर चुका है। विचारणीय यह है कि आखिर कार्यपालिका में बैठे वे कौन लोग हैं जिन्हें शीर्ष कोर्ट की अवमानना का भय भी नहीं है।
करीब सात साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने फिर इस पर चिंता जाहिर की है और देश में चल रहे सभी मुकदमों से इस धारा का संदर्भ हटाने का आदेश दिया है। इस कानून में प्रावधान था कि ऑनलाइन कंटेंट पर आपत्ति की शिकायत दर्ज होते ही किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकता है। इसके तहत उसे तीन साल की कैद और जुर्माने की सजा हो सकती थी। सुप्रीम कोर्ट मान चुका है कि ऐसा करना व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा। लेकिन अब भी देश में सैकड़ों मामले चल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कहा था कि राज्यों के सचिवों से संपर्क कर आदेश का पालन कराया जाए। किसी समय देश की नौकरशाही को ‘स्टील फ्रेम’ की संज्ञा दी गई थी। माना गया था कि यह ‘स्टील फ्रेम’ राजनीति या अन्य किसी दबाव से प्रभावित हुए बिना कानून के अनुसार अपना काम करेगा, ताकि न्याय का शासन बना रहे। आजादी के करीब 75 साल बाद भी हम इस ‘स्टील फ्रेम’ को कमजोर होते देख रहे हैं। केंद्र हो या राज्य, नौकरशाही को न तो कानून की परवाह है न ही अवमानना का डर। वजह साफ है कि नौकरशाही ने राजनीति से हाथ मिला लिया है और अपने आकाओं को खुश करने के लिए किसी भी कानून को ताक पर रखने से उन्हें परहेज नहीं है। इसके बदले उसे अपना उल्लू सीधा करने का मौका मिल रहा है।
नौकरशाही इसी में खुश है। हो भी क्यों नहीं, इन पर अब तक कानून का चाबुक वांछित सख्ती से पड़ा ही नहीं। इक्का-दुक्का मामले ही ऐसे सामने आते हैं जब नौकरशाही पर कोई ठोस कार्रवाई हो पाती है। होती भी है तो कुछ समय के बाद वह अपना दामन बचा ले जाने में सफल हो जाते हैं। चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर एक-दूसरे की मदद करने वाली भ्रष्ट नौकरशाही को बदलने का समय आ गया है। पुराने नौकरशाहों से भले ही ज्यादा उम्मीद न हो पर नए नौकरशाहों को जरूर स्थिति बदलने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।