आश्चर्य इस बात का है कि श्वान के काटने पर मुआवजा पाने के लिए भी पीड़ित को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
‘श्वान काटे तो हर दांत के निशान के हिसाब से देना होगा मुआवजा।’ पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए राहत भरा साबित होगा जो श्वान के काटने से आर्थिक और मानसिक पीड़ा का दंश झेलने को मजबूर होते हैं। देश की अदालतें आए दिन जनहित में इस तरह के फैसले सुनाती रहती हैं। विडंबना यह है कि कुछ फैसलों पर अमल होता है और कुछ पर नहीं। आश्चर्य इस बात का है कि श्वान के काटने पर मुआवजा पाने के लिए भी पीड़ित को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। अहम सवाल यह है कि नगरीय निकायों की लापरवाही से जुड़े इस तरह के मामले में भी मुआवजे के लिए पीड़ित को भटकने के लिए मजबूर क्यों किया गया?
यह कोई अकेला प्रकरण नहीं है। मुआवजे के दूसरे कई मामलों में भी पीडि़त को राहत अदालत के निर्देश पर ही मिल पाती है। इसकी वजह यह है कि मुआवजे को लेकर देश में आज भी कोई स्पष्ट नीति या नियम नहीं है। इसलिए सवाल यह भी उठता है कि क्या अदालत का कोई फैसला आने से पहले ही सरकार ऐसे पीडि़तों को मुआवजा देने के नियम तय नहीं कर सकती? पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला भारत के संदर्भ में और महत्त्वपूर्ण हो जाता है। हालत यह है कि देश में हर दिन लगभग 10 हजार लोग श्वानों के काटने से जख्मी हो जाते हैं। देश में हर साल 20 हजार से अधिक इसके कारण मौत के मुंह में चले जाते हैं। श्वान के काटने से दुनिया भर में सर्वाधिक मौतें भी भारत में ही होती हैं। ऐसे में श्वान के काटने पर मुआवजे की साफ नीति की जरूरत है। अहम सवाल यह भी है कि आखिर श्वान के काटने के सर्वाधिक मामले भारत में ही क्यों होते हैं? देश के शहरों, कस्बों ही नहीं गांवों से भी श्वान के काटने की खबरें आती रहती हैं। इस तरह के मामलों में मौत के मामले भी कई बार सुर्खियां बनते हैं। स्थानीय निकायों और पंचायतों की जिम्मेदारी है कि वे आवारा घूमने वाले श्वानों पर नियंत्रण रखें।
अनेक शहरों में स्थानीय प्रशासन की तरफ से श्वानों पर नियंत्रण के लिए समय-समय पर अभियान चलाए जाते हैं। केंद्र सरकार की तरफ से भी इसी साल एक अभियान चलाया गया था, लेकिन देखा गया है कि ऐसे अभियान रस्म अदायगी से आगे नहीं बढ़ पाते। आज जरूरत इस तरह के अभियान चलाने की जगह समस्या की जड़ में जाकर इसका स्थाई समाधान निकालने की है। श्वान के काटने पर राष्ट्रीय स्तर पर एक मुआवजा नीति भी बने। नीति सभी राज्यों से विचार-विमर्श करके बने। इससे अदालतों पर मुकदमों के अनावश्यक भार को भी कम किया जा सकता है।