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सत्ता संघर्ष में दांव पर लगा है कांग्रेस का ‘कर्नाटक’

20 मई, 2023 को दूसरी बार मुख्यमंत्री बने सिद्धारमैया अपने इस कार्यकाल की आधी अवधि पूरी कर चुके हैं और उप मुख्यमंत्री शिवकुमार चाहते हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाए।

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जयपुर

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Opinion Desk

Dec 04, 2025

राज कुमार सिंह , वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक

दावे भले ही 'हम साथ-साथ हैं' के किए जाएं, पर मुख्यमंत्री-उप मुख्यमंत्री का एक-दूसरे के यहां नाश्ता-भोजन के लिए जाना भी समाचार माध्यमों की सुर्खियां बनना कर्नाटक में सब कुछ ठीक नहीं होने का ही प्रमाण है। दिलचस्प तर्क यह भी कि ऐसी मुलाकातों से चुनावी वादे पूरा करने की कोशिशें मजबूत होंगी, जबकि उसके लिए सबसे उपयुक्त मंच मंत्रिमंडल की बैठक होती है। दरअसल कांग्रेस आलाकमान की सलाह पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार अपने जग जाहिर सत्ता संघर्ष को सौहार्द की आड़ में छिपाने में लगे हैं। 20 मई, 2023 को दूसरी बार मुख्यमंत्री बने सिद्धारमैया अपने इस कार्यकाल की आधी अवधि पूरी कर चुके हैं और उप मुख्यमंत्री शिवकुमार चाहते हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाए। दोनों के ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री रहने के, आलाकमान के फॉर्मूले की बड़ी चर्चा है। हालांकि ऐसे किसी फॉर्मूले की घोषणा कभी नहीं हुई, पर ऐसी चर्चाएं राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी सुनने में आई थीं। 2018 में मध्य प्रदेश में बनी कांग्रेस सरकार तो ज्योतिरादित्य सिंधिया के 'हाथ' छोड़ 'कमल' थाम लेने के चलते कोरोनाकाल में गिर गई थी, जबकि राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सरकारें सत्ता में वापसी नहीं कर पाईं।

छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव और सचिन पायलट ने मुख्यमंत्रियों क्रमश: भूपेश बघेल और अशोक गहलोत के साथ ही आलाकमान को भी ढाई-ढाई साल कुर्सी का फॉर्मूला याद दिलाया था, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। हां, अगले चुनाव में दोनों ही राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर अवश्य हो गई। इसलिए कर्नाटक का राजनीतिक घटनाक्रम इस बात पर भी निर्भर करेगा कि कांग्रेस आलाकमान ने राजस्थान और छत्तीसगढ़ से क्या सबक सीखा है।
सिद्धारमैया अपना कार्यकाल पूरा करने की बात कहते रहे हैं तो शिवकुमार आलाकमान का फैसला 'अंतिम' होने की। आलाकमान के बुलावे पर 'दिल्ली-दौड़' को दोनों ही तत्पर हैं। बेशक 77 साल के सिद्धारमैया के मुकाबले 63 साल के शिवकुमार अपेक्षाकृत कम उम्र के हैं, पर क्या वह मुख्यमंत्री बनने के लिए अगले चुनाव का इंतजार करना चाहेंगे- वह भी तब, जबकि अब कड़े मुकाबले वाले राज्यों में भी भाजपा या राजग के पक्ष में एकतरफा चुनाव परिणाम आ रहे हैं? यह भी खुला रहस्य है कि कांग्रेस के अंतर्कलह के बीच भाजपा कर्नाटक की सत्ता वापस पाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेगी।


साधन संपन्न शिवकुमार, नेहरू-गांधी परिवार के विश्वस्त माने जाते हैं। कर्नाटक के बाहर भी वह कांग्रेस के लिए संकटमोचक की भूमिका निभाते रहे हैं। इतनी वफादारी और उपयोगिता के बावजूद आलाकमान ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्रित्वकाल का अपना कथित वादा नहीं निभा पाता, तब क्या शिवकुमार अंतहीन इंतजार करने के बजाय ज्योतिरादित्य सिंधिया बनना पसंद करेंगे? कांग्रेस आलाकमान की समस्या यह है कि कर्नाटक में कोई भी फैसला उसके लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं होगा। इस आशंका को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता कि शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाए जाने की स्थिति में सिद्धारमैया ही भाजपा से दोस्ती कर लें। वह मूलत: कांग्रेसी तो हैं नहीं। लोकदल की पृष्ठभूमि वाले सिद्धारमैया, एचडी देवगौड़ा के जनता दल (सेक्यूलर) में भी रह चुके हैं, लेकिन उनके बेटे कुमारस्वामी से सत्ता महत्वाकांक्षाओं के टकराव की वजह से कांग्रेस में आना पड़ा। 224 सदस्यीय कर्नाटक विधानसभा में कांग्रेस के 135 विधायकों के मुकाबले भाजपा के पास 66 और जनता दल (सेक्यूलर) के पास 19 विधायक हैं ही। चार अन्य भी सत्ता के साथ गिने जा सकते हैं। दो-ढाई दर्जन विधायक भी पाला बदल लें तो 'खेल' हो जाएगा।


दलबदल कानून की ज्यादा चिंता इसलिए नहीं कि विधायकों से इस्तीफे दिलवा कर सदन की प्रभावी संख्या कम कर बहुमत का आंकड़ा नीचे लाने का जुगाड़ कर्नाटक में पहले भी आजमाया जा चुका है। कर्नाटक की राजनीति तीन प्रमुख समुदाय तय करते हैं: लिंगायत, वोक्कालिंगा और कुरबा। शिवकुमार कर्नाटक की दूसरी प्रमुख जाति वोक्कालिंगा से है तो सिद्धारमैया तीसरी प्रमुख जाति कुरबा से। कर्नाटक में राजनीतिक रूप से सर्वाधिक असरदार समुदाय लिंगायत, येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के चलते पिछले चुनाव में भाजपा से नाराज नजर आया। पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार और उप मुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी सरीखे वरिष्ठ नेताओं ने भी तब भाजपा छोड़कर कांग्रेस का हाथ थाम लिया था। भाजपा ने वोक्कालिंगा समुदाय से आनेवाले पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के जनता दल (सेक्यूलर) से गठबंधन कर नुकसान की भरपाई करनी चाही, लेकिन सत्ता विरोधी भावना से लेकर भ्रष्टाचार के आरोपों तक तमाम परिस्थितियां विरुद्ध साबित हुईं।


'डीके' के संबोधन से लोकप्रिय शिवकुमार राजनीतिक रूप से बेहद उपयोगी हैं, पर सिद्धारमैया खुद को कांग्रेस के लिए अपरिहार्य बनाना चाहते हैं। क्षत्रपों की मनमानी से कांग्रेस को राज्य-दर-राज्य हुए नुकसान से आलाकमान ने इतना सबक तो सीख लिया है कि किसी को भी पार्टी के लिए अपरिहार्य न बनने दें, लेकिन वैसा होने से रोकने के लिए जरूरी साहस अभी तक नहीं दिखा पाया है। समस्या यह भी है कि राहुल गांधी ओबीसी-दलित वर्ग को वापस कांग्रेस से जोडऩे की कवायद में लगे हैं और सिद्धारमैया ओबीसी ही हैं, जबकि शिवकुमार अगड़े वर्ग से हैं। इसलिए दोनों के बीच अहं के सत्ता-संघर्ष में आलाकमान मल्लिकार्जुन खरगे के रूप में सुरक्षित मध्य मार्ग भी चुन सकता है, जो दलित हैं। खरगे केंद्र में मंत्री से लेकर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह लिए, पर गृह राज्य का सीएम बनने का सपना अभी तक अधूरा है।