देश में सीनियर सेकेंडरी परीक्षा के बाद विद्यार्थियों के द्वारा चुने जाने वाले तकनीकी पाठ्यक्रमों के लिए उच्च स्तरीय संस्थान बहुत कम है। मांग और आपूर्ति के संतुलन को सही करने के लिए गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के केंद्रों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। साथ ही शिक्षकों में गुणवत्ता अभिवर्धन के लिए संकाय अभिवर्धन कार्यक्रम गहनता से चलाए जा सकते हैं।
प्रदीप कुमार बोरड
सेवानिवृत्त आइएएस
विद्यार्थियों की आत्महत्या के मामलों को कई आयामों से देखना होगा। थ्री इडियट्स फिल्म में इस मुद्दे को बहुत ही अच्छे तरीके से उठाया गया है। इस फिल्म से जो संदेश मिलता है, वह यह है कि बच्चों को अपनी रुचि और योग्यता के अनुसार अपना भविष्य चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। मुश्किल यह है कि अभिभावक बच्चों पर अपनी महत्त्वाकांक्षा लाद देते हैं। बच्चों को यह पता ही नहीं चलता कि वे जिस लक्ष्य को प्राप्त करने की दौड़ में लगे हुए हैं, वह उनकी रुचि का है या उन पर लदा हुआ एक भार है।
देश में सीनियर सेकेंडरी परीक्षा के बाद विद्यार्थियों के द्वारा चुने जाने वाले तकनीकी पाठ्यक्रमों के लिए उच्च स्तरीय संस्थान बहुत कम है। मांग और आपूर्ति के संतुलन को सही करने के लिए गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के केंद्रों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। साथ ही शिक्षकों में गुणवत्ता अभिवर्धन के लिए संकाय अभिवर्धन कार्यक्रम गहनता से चलाए जा सकते हैं। इसके अलावा देश में जो उच्च स्तरीय अध्यापक हैं, उन्हें राष्ट्रीय संपत्ति मानते हुए उनके व्याख्यान ऑनलाइन दूसरी संस्थाओं को उपलब्ध कराए जा सकते हैं। जो उच्च स्तरीय शिक्षण संस्थान हैं, उनके पाठ्यक्रम और शिक्षण के तरीकों को दूसरे संस्थानों में अनिवार्य रूप से लागू किया जाए। प्रतियोगी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम में भी परिवर्तन आवश्यक है। विद्यार्थियों को खेलकूद के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। शोध अध्ययनों से पता चलता है कि खेलों से दूर रहने वाले विद्यार्थी तनाव नहीं झेल पाते। जो विद्यार्थी खेलकूद की गतिविधियों से जुड़े रहते हैं, वे हारना भी जानते हैं और जीत को पचाना भी। साथ ही दसवीं एवं 12वीं कक्षाओं के प्राप्तांकों को भी प्रतियोगी परीक्षाओं में महत्त्व दिया जाना चाहिए। इसके लिए सीबीएसई व राज्यों के बोर्डों की परीक्षा एक समान की जा सकती है। वैसे अब एनसीईआरटी की पुस्तकें पूरे देश में लागू हो चुकी हैं। इसलिए पूरे देश में एक परीक्षा पद्धति लागू किया जाना व्यावहारिक होगा। स्कूली शिक्षा के दौरान नैतिक शिक्षा पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। कोचिंग संस्थानों को अभिभावकों एवं विद्यार्थियों के लिए काउंसलिंग की व्यवस्था भी करनी चाहिए। वर्तमान में 10वीं और 12वीं की बोर्ड की जो परीक्षाएं होती हैं, वे प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्नों से बहुत ही भिन्न होती हैं। इसलिए दसवीं में 12वीं बोर्ड की परीक्षाएं और प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्नों का स्तर और पैटर्न भी एक जैसा होना चाहिए। ऐसा करने का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि विद्यालयों के अध्यापकों के शैक्षिक स्तर में स्वत: ही वृद्धि हो जाएगी।
जब विद्यालय के शिक्षकों का स्तर बढ़ेगा, तो निश्चित रूप से कोचिंग संस्थानों की मांग कम हो जाएगी। कोचिंग में पढऩे वाले विद्यार्थी इतने अधिक एकाकी हो जाते हैं कि उनको अपने आस-पास क्या घट रहा है, उसका भी खास ध्यान नहीं रहता। इस वजह से उनकी सोच का दायरा भी संकुचित हो जाता हैं। इसलिए इन प्रतियोगी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम में एक भाग सामान्य ज्ञान का भी होना चाहिए। इसमें विद्यार्थियों के स्तर का समसामयिकी ज्ञान, खेलकूद की गतिविधियों के बारे में जानकारी भी शामिल की जानी चाहिए। दबाव से उबरने के लिए स्कूलों में मनोरंजन से जुड़ी गतिविधियों के आयोजन पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। ध्यान रहे, शिक्षा और कॅरियर जरूरी हंै, लेकिन ये जीवन से ज्यादा जरूरी नहीं हैं।