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बीमारियों के खतरे बहुत हैं मछली खाने से

फार्म फिश के साथ मुफ्त में कई सारे परजीवी आते हैं इनमें समुद्री जूं, विषाणु, वायरस, भारी धातुएं, एंटीबॉयटिक अपशिष्ट और जीवाणु आदि शामिल हैं

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Sunil Sharma

Oct 24, 2017

fish

fish as food

- मेनका संजय गांधी

मछलियों का उत्पादन बढ़ाने और ज्यादा लाभ कमाने के लिए मछली घनत्व बहुत अधिक रखा जाता है। यहां तक कि मत्स्य पालक तब तक मछलियां भरते रहते हैं, जब तक कि वे मर ना जाएं।

कृषि मंत्रालय ने हाल ही मछली के व्यावसायिक उत्पादन पर जोर देने की बात कही है तो आपको भी मालूम होना चाहिए कि जब आप मछली खाते हैं तो आपको और क्या मिलता है? फार्म फिश के साथ मुफ्त में कई सारे परजीवी आते हैं इनमें समुद्री जूं, विषाणु, वायरस, भारी धातुएं, एंटीबॉयटिक अपशिष्ट और जीवाणु आदि शामिल हैं। मत्स्य पालन की प्रक्रिया में एक बाड़े में मछली के अंडे विकसित किए जाते हैं। मातृ मछली से अलग कर छोटी मछलियां वहीं के तालाब या समुद्री हिस्सों में डाल दी जाती हैं। मछलियों का उत्पादन बढ़ाने व ज्यादा लाभ कमाने के लिए मछली घनत्व बहुत अधिक रखा जाता है। यहां तक कि मत्स्य पालक तब तक मछलियां भरते रहते हैं, जब तक कि वे मर ना जाएं। 10 फीसदी मछलियों की मौत तो स्वीकार्य तथ्य है।

चिंताजनक हालात तो तब पैदा होते हैं जब 30 प्रतिशत मछलियों की मौतों के बाद उनका भण्डारण रोका जाता है। मछलियां इतनी ज्यादा होती हैं कि लगता है, जैसे मछली नहीं मुर्गी फार्म हो, जहां वे अपने पंख तक नहीं हिला पातीं। मछलियों की भारी भीड़ में समुद्री जुंएं मछली के चेहरे का निचला हिस्सा खाती हैं। इससे मछलियां कई बीमारियों की शिकार हो जाती हैं। 2012 में कनाडाई किराना चेन सोबे को सारी दुकानों से अपनी मछलियां वापस मंगवानी पड़ी थी, क्योंकि उनमें जुएं पाई गई थीं। स्कॉटलैंड में सरकार ने निरीक्षण के दौरान पाया कि फार्म मछलियों में प्रत्येक मछली पर 44 जुंएं पाई गईं। कल्पना कर सकते हैं कि भारत में क्या स्थिति होगी, जहां फार्म निरीक्षण नहीं किया जाता और सडक़ों पर ही मछलियां बेची जाती हैं।

समुद्री जुंओं में पाए जाने वाले एक बैक्टीरिया फर्नोकुलोइसिस से इंसानों के सिर पर एक प्रकार का संक्रमण हो जाता है। हालत गंभीर होने पर रोगी बुखार व फेफड़ों संबंधी बीमारी से पीडि़त हो सकता है। ज्यादातर मछली फार्म में एमियोबिक नामक बीमारी आम है। यह अमीबा नियोफार्मोबिया पेरूरान्स के कारण होती है। इसकी रोकथाम के लिए पशुओं को डी वॉर्मिंग के लिए दी जाने वाली दवा का इस्तेमाल किया जाता है।

इस प्रकार मछली खाने वाले मनुष्य ना केवल बैक्टीरिया के शिकार होते हैं बल्कि अनजाने ही वे उन एंटीबायटिक का भी सेवन कर लेते हैं, जो इन मछलियों को दिया जाता है। मत्स्य पालन फार्मो में रासायनिक उर्वरक व कीटनाशकों का खुला इस्तेमाल किया जाता है। इसकी वजह से शारीरिक विकृति व फेफड़े खराब होने का डर रहता है। 40 फीसदी मछलियां कृत्रिम नस्लीय तौर पर तैयार की जाती है। क्या अब भी आप मछली खाना चाहेंगे?