
shinzo abe
- प्रो. स्वर्ण सिंह, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
आबे कई बार कह चुके हैं कि वे वर्ष 2020 तक यानी जिस वर्ष टोक्यो ओलंपिक भी होंगे, जापान में कई मौलिक परिवर्तन लाने को प्रतिबद्ध हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण जापान के संविधान के अनुच्छेद नौ को बदलने की बात है जिसके तहत जापान युद्ध के विकल्प को त्याग चुका है।
बीते माह जर्मनी की एंजेला मर्केल के चौथी बार चांसलर चुने जाने के बाद अब जापान के शिंजो आबे का चौथी बार आम चुनावों में प्रचंड बहुमत से जीत कर आना विश्व में लोकतंत्र के बदलते स्वरूप का उदाहरण है। दैनिक जीवन में सूचना क्रांति के बढ़ते हस्तक्षेप से हर कदम पर निर्णय लेने की रफ्तार बढ़ती जा रही है। इसका सीधा असर सामने खड़े सवाल के विश्लेषण में संयम और संतुलन पर नजर आता है। परिणाम ये कि लोकतंत्र में आम चुनाव ज्यादातर सतही बहाव से प्रभावित नजर आते हैं।
विरोधी दल की खस्ता हालत और अपनी घटती लोकप्रियता को देखकर जब शिंजो आबे ने जब अचानक एक वर्ष पूर्व ही चुनावों की घोषणा कर डाली तो उनके लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) के गठबंधन को जापान की संसद (डाइट) के निचले सदन की कुल 465 सीटों में से 312 पर जीत प्राप्त हुई जो दो तिहाई से भी दो सीट ज्यादा है। डाइट के ऊपरी सदन में एलडीपी गठबंधन को पहले ही दो तिहाई से अधिक बहुमत प्राप्त है। इस तरह इन चुनावों के बाद शिंजो आबे-जो कि दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था और अमरीका के खास सहयोगी देश के प्रधानमंत्री हैं, पूरे विश्व में प्रभावशाली बनकर उभरे है।
शिंजो आबे यदि अपना कार्यकाल 2021 में पूरा करते हैं तो वे जापान के सर्वाधिक लंबे कार्यकाल वाले प्रधानमंत्री होंगे। वे बहुत ही प्रभावशाली राजनीतिक परिवार ताल्लुक रखते हैं। उनके नाना नोबुसुके किशि जापान के प्रधानमंत्री थे। उनके दादा कान आबे 1937 से 1946 और उनके पिता शिनतारो आबे 1958 से 1991 तक डाइट के सदस्य थे। इस चुनाव के असर को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। आबे कई बार कह चुके हैं कि वे वर्ष 2020 तक यानी जिस वर्ष टोक्यो ओलंपिक भी होंगे, जापान में कई मौलिक परिवर्तन लाने को प्रतिबद्ध हैं।
इसमें सबसे महत्वपूर्ण जापान के संविधान के अनुच्छेद नौ को बदलने की बात है जिसके तहत जापान युद्ध के विकल्प को त्याग चुका है। हालांकि किसी तरह से इस अनुच्छेद की व्याख्या में जापान आत्मरक्षा का विकल्प ले चुका है किंतु फिलहाल इसकी ‘आत्मरक्षा सेना’ को एक सामान्य सेना का दर्जा दिलाने की बहस वहां छिड़ी हुई है। अब डाइट के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत होने से उम्मीद है कि इस अनुच्छेद में परिवर्तन लाया जा सकता है। हालांकि यह इतना आसान नहीं होगा। ऐसे प्रस्ताव पर डाइट के दोनों सदनों के अनुमर्थन के बाद भी इसे जनमतसंग्रह में बहुमत से पारित करवाना होगा। अभी तक के सर्वेक्षणों में जापान के लोग इस प्रस्ताव पर एकमत नहीं हैं। आबे अपनी चुनौतियों से वाकिफ हैं और वे अपनी अन्य नीतियों को और आगे बढ़ाएंगे। उनका लगातार उत्तर कोरिया पर कड़ा रुख बने रहने की उम्मीद है।
इस सप्ताह अमरीका के विदेश मंत्री रेक्स टिलर्सन की जापान यात्रा में यह मुद्दा उभरकर सामने आएगा। उत्तर कोरिया के नेता किंग जोंग उन जो जापान को समुद्र में डुबोने की बात करते हैं, को भी इन चुनावों का आकलन करना होगा। इन चुनावों का असर चीन में हो रहे कम्युनिस्ट पार्टी के 19वें सम्मेलन में भी नजर आएगा। चीन में राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बढ़ते दबदबे के साथ शिंजो आबे का भी प्रभाव व्यापक हो रहा है। ऐसे में आबे के समक्ष शी चिनफिंग के साथ बेहतर तालमेल बनाने की चुनौती होगी। आबे के लिए तीसरी बड़ी चुनौती जापान की आर्थिक वृद्धि दर बढ़ाने और रोजगार सृजन की होगी। पिछले पांच साल की ‘आबेनॉमिक्स’ के अंतर्गत सरकारी निवेश के बहुत अच्छे परिणाम नहीं आए हैं। इसके अलावा शिंजो आबे एशिया प्रशांत क्षेत्र में लोकतांत्रिक देशों के गठजोड़ के पक्षधर रहे हैं।
भारत से शिंजो आबे का शुरू से ही खास रिश्ता रहा है। वे कई बार भारत आ चुके हैं और इससे भी ज्यादा वे भारतीय नेताओं से बहुराष्ट्रीय सम्मेलनों में मिलते रहे हैं। आबे के अभी तक कार्यकाल भारत-जापान संबंधों के लिए सकारात्मक रहे हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिंजो आबे के तालमेल से कई प्रस्ताव सकारात्मक परिणति तक पहुंचे हैं। इनमें सबसे अहम भारत-जापान सिविल न्यूक्लियर सहयोग का जुलाई में क्रियान्वित होना माना जाता है। इसका असर जापान तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह अन्य देशों के साथ परमाणु सहयोग पर भी पड़ेगा। उदाहरण के तौर पर अमरीका के वेस्टिंग हाउस समूह जिसे छह परमाणु रिएक्टर आध्र प्रदेश में लगाने थे, अटका हुआ था। इस कंपनी के अधिकतम शेयरों की मालिक जापान की कंपनी तोशिबा है।
गत वर्ष नवंबर में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टोक्यो यात्रा में भी इसके साथ अन्य कई मुद्दों पर आपसी समझ बनी थी, जिसके नतीजे धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं। इसी संदर्भ में शिंजो आबे की सितंबर की भारत यात्रा के दौरान भारत-जापान ग्रोथ कॉरिडोर लांच किया गया जिसमें हिंद महासागर के तटीय देशों को जोडऩे की बात है। आज जबकि अमरीका के राष्ट्रपति मित्र देशों के मामले में संकुचित दृष्टिकोण रखते हुए अमरीका फस्र्ट की बात कर रहे हैं तो ऐसे में एशिया प्रशांत क्षेत्र में शांति व स्थिरता बनाए रखने की जिम्मेदारी भारत-जापान पर है। ऐसे में आबे भारत के साथ मिलकर इस दिशा में कार्य कर सकते हैं।
Published on:
24 Oct 2017 03:28 pm
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