फ्रांस 2017 से 2021 के दौरान भारत के लिए दूसरा सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता रहा है। ऐसे समय में, जब भारतीय सेना को आधुनिकतम साजो-सामान से लैस करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है, फ्रांस के साथ रक्षा सहयोग में और बढ़ोतरी के आसार हैं।
अमरीका के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 13 जुलाई से शुरू हो रहा फ्रांस दौरा भारत के रक्षा क्षेत्र के लिए अहम साबित हो सकता है। यह दौरा इस लिहाज से भी अहम है कि भारत और फ्रांस इस साल रणनीतिक साझेदारी की रजत जयंती मना रहे हैं। इस साझेदारी के तहत ढाई दशक के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी के साथ संस्कृति के क्षेत्र में परस्पर सहयोग काफी बढ़ा है। फ्रांस 2017 से 2021 के दौरान भारत के लिए दूसरा सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता रहा है। ऐसे समय में, जब भारतीय सेना को आधुनिकतम साजो-सामान से लैस करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है, फ्रांस के साथ रक्षा सहयोग में और बढ़ोतरी के आसार हैं।
फ्रांस से 36 रफाल विमान मिलने के बाद भारत अब उससे समुद्री लड़ाकू जेट रफाल-एम (मैरीटाइम) खरीदना चाहता है। फ्रांस ने इसे नौसेना की जरूरतों के हिसाब से विकसित किया है। यह विमान अत्याधुनिक समुद्री प्रणालियों से लैस है। इसमें युद्धपोतों के अलावा पनडुब्बियों का पता लगाने के लिए रडार भी लगे हुए हैं। भारतीय नौसेना विमानवाहक पोत आइएनएस विक्रांत पर तैनात करने के लिए पुराने मिग 29-के का विकल्प काफी समय से तलाश रही थी। यह तलाश रफाल-एम की खूबियां जानने के बाद पूरी हुई। प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान 26 रफाल-एम खरीदने पर समझौता हो सकता है।
भारत-फ्रांस के बीच रक्षा क्षेत्र के अलावा व्यापार और निवेश में साझेदारी भी लगातार बढ़ रही है। फ्रांस 2021-22 में 12.42 अरब डॉलर के सालाना व्यापार के साथ भारत के प्रमुख व्यापारिक भागीदार के रूप में उभरा है। इसके अलावा अप्रेल 2000 से जून 2022 के बीच वह 10.31 अरब डॉलर के संचयी निवेश के साथ भारत में 11वां सबसे बड़ा विदेशी निवेशक रहा। भारत में फ्रांस की करीब एक हजार कंपनियां हैं, जो करीब तीन लाख भारतीयों को रोजगार दे रही हैं। फ्रांस में भारत की करीब 130 कंपनियां चल रही हैं। इनमें फार्मा, सॉफ्टवेयर, स्टील और प्लास्टिक बनाने वाली कंपनियां शामिल हैं।
हिंद महासागर क्षेत्र में चीन का बढ़ता वर्चस्व भारत और फ्रांस के लिए चिंता का विषय है। फ्रांस मानता है कि हिंद-प्रशांत और दक्षिण चीन सागर में चीन आक्रामक होता जा रहा है। इन क्षेत्रों में नौवहन की स्वतंत्रता के साथ अंतरराष्ट्रीय नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करने की जरूरत है। फ्रांस हिंद-प्रशांत को खुले और समावेशी क्षेत्र के तौर पर संरक्षित रखना चाहता है, जो किसी भी दबाव से मुक्त हो। भारत भी प्रमुख समुद्री मार्ग मुक्त रखे जाने का पक्षधर है। प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान फ्रांस से इस संवेदनशील मुद्दे पर भी चर्चा हो सकती है और चीन की मनमानी के खिलाफ साझा रणनीति की रूपरेखा तैयार हो सकती है।