
hardik patel
जिसकी आशंका थी, गुजरात में वही सब हो रहा है। पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल की अश्लील सीडी सामने आई है। उनकी और उनके मित्रों की और ऐसी सीडी आने की बात भी सामने आ रही है। सीडी असली है या नकली इसका फैसला तो फोरेंसिक जांच से होगा। लेकिन मैली हो चुकी राजनीति के और गंदी होने के संकेत जरूर मिलने लगे हैं। विकास से शुरू हुई बहस जातिवाद से होते हुए चरित्र हनन की राजनीति तक पहुंच चुकी है। आशंका चुनाव के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की तरफ बढऩे की भी व्यक्त की जा रही है। सवाल ये कि चुनाव जीतने के लिए चरित्र हनन की ये राजनीति जरूरी है क्या?
महत्वपूर्ण ये नहीं कि ये सीडी किसने बनवाई और इस मौके पर जारी क्यों करवाई? महत्वपूर्ण ये है कि राजनेताओं को ऐसा करने की नौबत क्यों आने लगी? २२ साल से सत्ता की सवारी कर रही भाजपा ने यदि वाकई विकास किया होता तो क्या ऐसी सीडी सामने आती? कांग्रेस ने यदि सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाई होती तो क्या राहुल गांधी को मंदिरों की शरण में जाने की जरूरत पड़ती? राजनीतिक दल जब-जब जन अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाते, तब-तब ऐसी तस्वीर देखने को मिलती है। अश्लील सीडी को सामने लाने अथवा मन्दिर-मस्जिद जाने में किसी को कोई ऐतराज नहीं। ऐतराज है तो सिर्फ इसका कि मई में बनाई गई सीडी नवम्बर में सामने क्यों आ रही है? सीडी मई में ही सार्वजनिक क्यों नहीं कर दी गई? राजनेताओं को मंदिर अभी क्यों याद आ रहे हैं?
गुजरात का चुनावी इतिहास किसी से छिपा नहीं है। सीडी वार किस सीमा तक जाएगा, कोई नहीं जानता? दुख इस बात का है कि चरित्र हनन की राजनीति के इस दौर में राजनीति को साफ बनाए रखने का पक्षधर कोई नजर नहीं आ रहा। शर्मसार करने वाली इस राजनीति की खिलाफत करने वाला कोई दिखाई नहीं दे रहा। लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। राजनीति में नैतिक मूल्यों पर कभी चर्चा होगी? विचारधारा और सिद्धान्तों पर बहस होगी? वोट देने का आधार क्या सिर्फ और सिर्फ साम्प्रदायिकता और जातिवाद रह जाएंगे? यदि हां, तो क्या इसे लोकतंत्र माना जाए? और यदि नहीं तो इसका तोड़ क्या है? सवाल गंभीर है, जवाब भी गंभीरता से तलाशा जाना चाहिए। लोकतंत्र तभी स्वस्थ रह पाएगा।

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