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डॉ. ऋतु सारस्वत, समाजशास्त्री एवं स्तंभकार
हाल ही देश की शीर्ष अदालत ने गौर आचार्जी बनाम त्रिपुरा राज्य मामले में निर्णय देते हुए पति की दोषसिद्धि को बरकरार रखा। यह मामला विवाह के मात्र 15 माह के भीतर एक युवती की मृत्यु से संबंधित था। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा, ‘क्या इस युवा मृतका का जीवन बचाया जा सकता था? क्या सामाजिक अपयश के भय ने इस मृतका को भेडिय़ों के बीच धकेल दिया? ये ऐसे प्रश्न हैं, जो संभवत: सदैव काल्पनिक ही बने रहेंगे। मृतका के परिजनों ने विश्वास कर लिया था कि परिस्थितियां सुधर जाएंगी लेकिन उनकी आशाएं उस समय चकनाचूर हो गईं, जब मृतका का अपने वैवाहिक घर में दुखद अंत हो गया। आशा है कि उसके जीवन की कहानी अनेक लोगों के लिए आंखें खोलने वाली सिद्ध होगी।’
साथ ही, शीर्ष अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि विवाह के कुछ ही दिनों बाद मृतका को दहेज की मांग को लेकर प्रताडऩा का सामना करना पड़ा था। उसने अपने माता-पिता से उसे बचाने की गुहार लगाई थी और कुछ समय के लिए मायके में भी रही थी। किंतु हर बार समझौता कराने और उसे वापस ससुराल भेजने के प्रयास किए गए। गांव के बुजुर्गों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया और तथाकथित समझौते कराए गए। इसमें संदेह नहीं कि दहेज उत्पीडऩ और दहेज हत्या के अधिकांश मामलों में बेटियां सबसे पहले अपने परिवार और विशेष रूप से अपने माता-पिता से सहायता की अपेक्षा करती हैं। परंतु दुर्भाग्यवश अनेक मामलों में समझौते को प्राथमिकता दी जाती है। यहीं से समस्या और गंभीर हो जाती है। जब प्रताडऩा की शिकायत को संकट के संकेत के रूप में देखने के बजाय एक अस्थायी वैवाहिक विवाद मान लिया जाता है, तब पीडि़ता को उसी वातावरण में लौटने के लिए प्रेरित किया जाता है, जहां से वह सहायता की अपेक्षा लेकर बाहर निकली थी।
समाधान केवल वैधानिक व्यवस्थाओं में नहीं
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी का महत्त्व भी इसी तथ्य में निहित है कि अनेक बार त्रासदी किसी एक घटना का परिणाम नहीं होती, बल्कि उन चेतावनियों की अनदेखी का परिणाम होती है, जिन्हें समय रहते गंभीरता से लिया जाना चाहिए था। दहेज निषेध अधिनियम को लागू हुए पैंसठ वर्ष हो चुके हैं। इस अवधि में कानूनों को और अधिक कठोर बनाया गया, दंडात्मक प्रावधान जोड़े गए और न्यायालयों ने गंभीर टिप्पणियां भी कीं। इसके बावजूद दहेज उत्पीडऩ और दहेज मृत्यु के मामले सामने आ रहे हैं। यह तथ्य संकेत करता है कि गहरी सामाजिक जड़ों वाली समस्याओं का समाधान केवल वैधानिक व्यवस्थाओं में नहीं खोजा जा सकता। दहेज की समस्या का स्थायी समाधान न्यायालयों और कानूनों से कहीं अधिक समाज के आत्ममंथन में निहित है। यक्ष प्रश्न यह है कि 21वीं सदी के भारत में भी दहेज जैसी कुप्रथा आखिर जीवित क्यों है? इस प्रश्न का उत्तर कहीं न कहीं उस सामाजिक मानसिकता में छिपा है, जो यह मानकर चलती है कि धन और उपहारों के माध्यम से बेटी के वैवाहिक जीवन को सुरक्षित और सुखी बनाया जा सकता है। विडंबना यह है कि जिस दहेज को अनेक परिवार बेटी की सुरक्षा का माध्यम समझते हैं, वही कई बार असुरक्षा की भूमि तैयार कर देता है। दहेज की सामाजिक स्वीकृति का स्तर इतना गहरा है कि अपवादस्वरूप अगर कोई परिवार दहेज लेने से इनकार कर देता है, तो उसे शंका की दृष्टि से देखा जाता है। यह स्थिति स्वयं इस बात का प्रमाण है कि दहेज केवल एक कुप्रथा नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक मानसिकता का हिस्सा बन चुका है।
सामाजिक प्रतिस्पर्धा का विषय बन चुका है
दहेज की निरंतरता का एक कारण यह भी है कि यह अब केवल आर्थिक लाभ का माध्यम नहीं रह गया, बल्कि सामाजिक प्रतिस्पर्धा का विषय बन चुका है। एक परिवार को विवाह में प्राप्त धन-संपदा और उपहार दूसरे परिवारों की अपेक्षाओं का आधार बन जाते हैं। परिणामस्वरूप दहेज की मांग आवश्यकता से नहीं, बल्कि तुलना, प्रतिस्पर्धा और लालच से संचालित होने लगती है। उल्लेखनीय है कि दो दशक पूर्व दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के प्रवर्तन एवं कार्यान्वयन संबंधी मामले में सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने भी इसी समस्या की जड़ों की ओर संकेत किया था। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा था, ‘संभवत: इस समस्या को समाप्त करने के लिए एक सामाजिक क्रांति की आवश्यकता है। दहेज देने से इनकार, दहेज की मांग किए जाने पर लड़कियों द्वारा विवाह से इनकार तथा दहेज मांगने वालों को सामाजिक रूप से कलंकित करना ही अंतत: इस प्रथा को समाप्त कर सकता है अथवा कम से कम इसके प्रसार को कम कर सकता है।’ दुर्भाग्यवश, लगभग 21 वर्ष बाद भी यह प्रश्न प्रासंगिक बना हुआ है कि क्या हम उस सामाजिक क्रांति की दिशा में आगे बढ़ पाए हैं, जिसकी आवश्यकता सर्वोच्च न्यायालय ने 2005 में महसूस की थी?
यदि इस प्रश्न का उत्तर सकारात्मक होता, तो संभवत: आज भी दहेज उत्पीडऩ, दहेज हत्या और विवाह के नाम पर होने वाले आर्थिक शोषण की इतनी बड़ी संख्या हमारे सामने न होती। दहेज के विरुद्ध संघर्ष केवल न्यायालयों, पुलिस या विधायिका का दायित्व नहीं है। यह हर परिवार, हर अभिभावक की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक हम दहेज को प्रतिष्ठा, सुरक्षा, सामाजिक हैसियत अथवा आर्थिक उपलब्धि के रूप में देखना बंद नहीं करेंगे, तब तक कोई भी कानून इस समस्या का पूर्ण समाधान नहीं कर सकेगा।
Updated on:
08 Jun 2026 06:10 pm
Published on:
08 Jun 2026 04:28 pm
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