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नाट्य में समाहित है हमारी संस्कृति की अनोखी धरोहर

कालिदास ने नाटक को चाक्षुष -यज्ञ कहा है। नाटक साहित्य की ही विधा है। स्वाभाविक ही है कि बहुतेरे ऐसे हैं, जो उन्हें पढ़कर ही संतोष कर लेते हैं। पर, बहुत सारे नाटक देखने के बाद समझ यही आया है कि मंचीय प्रदर्शन में ही कोई लिखा नाटक अर्थ की पूर्णता के प्रवेश द्वार तक ले जाता है। किसी एक ही नाटक की जब अलग-अलग निर्देशक प्रस्तुति करते हैं, तो उसे देखने वाले भी अर्थ की अनंत संभावनाओं से साक्षात करते हैं। भरत मुनि ने नाटक को 'सर्वशिल्प-प्रवर्तकम्' कहा है, क्योंकि इसमें कई कलाओं का समावेश है।

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Patrika Desk

May 21, 2023

नाट्य में समाहित है हमारी संस्कृति की अनोखी धरोहर

नाट्य में समाहित है हमारी संस्कृति की अनोखी धरोहर

डॉ. राजेश
कुमार व्यास
कला समीक्षक

कालिदास ने नाटक को चाक्षुष -यज्ञ कहा है। नाटक साहित्य की ही विधा है। स्वाभाविक ही है कि बहुतेरे ऐसे हैं, जो उन्हें पढ़कर ही संतोष कर लेते हैं। पर, बहुत सारे नाटक देखने के बाद समझ यही आया है कि मंचीय प्रदर्शन में ही कोई लिखा नाटक अर्थ की पूर्णता के प्रवेश द्वार तक ले जाता है। किसी एक ही नाटक की जब अलग-अलग निर्देशक प्रस्तुति करते हैं, तो उसे देखने वाले भी अर्थ की अनंत संभावनाओं से साक्षात करते हैं। भरत मुनि ने नाटक को 'सर्वशिल्प-प्रवर्तकम्' कहा है, क्योंकि इसमें कई कलाओं का समावेश है।
इधर भास के लगभग सभी नाटकों का पारायण किया । कुछ दिन पहले कवि और चिंतन से जुड़े रंगकर्मी भारत रत्न भार्गव ने अपनी दो पुस्तकें भेजी थी, 'महाकवि भास के संपूर्ण नाटक' और 'महाकवि भास का नाट्य वैशिष्ट्य'। भास के उपलब्ध नाट्य लेखन को संस्कृत और अंग्रेजी से हिंदी में इनमें जीवंत ही नहीं किया गया है, बल्कि उनकी एक तरह से मीमांसा है और फिर संहिता भी। भास के सभी नाटकों के अर्थ मर्म तक पहुंचाती इन पुस्तकों में भास के नाट्य लेखन में छिपी असीमित मंचीय और अनंत अर्थ संभावनाओं का भी उजास है। नाटकों के विविध प्रसंगों के आलोक में जो विश्लेषण भारतरत्न भार्गव ने किया है, वह अनोखा है। मुझे लगता है, इधर के वर्षों में इस तरह का यह अपने आप में अपूर्व कार्य है। साहित्य, कला और संस्कृति की दृष्टि से अनुकरणीय भी। भास से कोई सौ वर्ष बाद कालिदास हुए हैं। पर अपने नाटक 'मालविकाग्निमित्रम्' में सूत्रधार के जरिए वह भास का संदर्भ देते हुए यह कहलवाते हैं कि जब भास जैसे नाटककार के नाटक पहले से हैं, तो फिर कालिदास जैसे नए नाटककार का नाटक क्यों? इस सवाल का उनका जवाब भी अनूठा है कि पुराना जो है, वही श्रेष्ठ नहीं है। नए की भी परीक्षा होनी चाहिए। इस दृष्टि से भारतरत्न भार्गव के भास के नाट्यकर्म पर किए कार्य को अनुभूत करने की जरूरत है।
भास के नाटकों में महाभारत आधारित छह नाटक हैं-मध्यमव्यायोग, कर्णभारत, उरुभंग, पंचरात्र और दूतवाक्य। दो-अभिषेक और प्रतिभा वाल्मीकि रामायण पर आधारित हैं। एक-बालचरित कृष्ण कथाओं पर और चार उनके अपने कथानक के हैं-स्वप्नवासवदत्ता, प्रतिज्ञा यौगन्धरायण, अविमारक और चारूदत्त। पढ़ेंगे तो लगेगा, नाट्य लेखन में कितनी मंचीय संभावनाएं उन्होंने हमें सौंपी हैं। नाटकों में उनकी अपनी दृष्टि, लेखन की विरल युक्तियां और महाभारत या दूसरी पुराण कथाओं से इतर भी स्थापना के अद्भुत प्रसंग हैं। मसलन उन्होंने दूतवाक्य में सुदर्शन चक्र और अन्य आयुधों को नाट्यपात्र रूप में जीवंत किया है, तो 'मध्यमव्यायोग' में जीवित रहते हुए व्यक्ति के तर्पण की त्रासदी की अद्भुत व्यंजना की है। 'स्वप्नवासवदत्ता' का मूर्ति में रूपायित उनका वह प्रसंग तो बहुतों को स्मरण होगा, जिसमें हाथी पर उदयन वासवदत्ता को भगाए ले जा रहा है, सैनिक पीछे भाग रहे हैं और उदयन का अनुचर स्वर्णमुद्राएं फेंक रहा है। सैनिक उन्हें बटोरने में लगे हैं। याद नहीं पर संभवत: वाराणसी के भारत कला भवन में कभी मूर्ति में इस दृश्य का आस्वाद किया था, जो अब भी जहन में बसा है। भारत रत्न भार्गव ने भास के संपूर्ण नाट्यकर्म के अनुवाद और संपादन का ही महती कार्य नहीं किया है, विशद विश्लेषण भी किया है। क्या ही अच्छा हो, ऐसी मौलिक दृष्टि में ही हमारी कला-संस्कृति निरंतर ऐसे ही पुनर्नवा होती रहे।