
अरावली पर्वतमाला की किस्मत उसके लिए सरकार के स्तर पर तय करने के विरोध में जो स्वर फूट रहे थे, वे निराधार नहीं थे और न ही राजनीति या स्वार्थ से प्रेरित थे। वन और पर्यावरण मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट ने इसे स्थापित कर दिया है। ताजा रिपोर्ट यह है कि अरावली में 12 बड़ी दरारें हैं और ये इतनी खतरनाक साबित हो रही हैं कि थार को पश्चिम से पूर्व की ओर खिसकाती आ रही हैं। इससे अरावली की रेगिस्तान को रोकने की क्षमता का तेजी से क्षरण हो रहा है। इसमें राजस्थान के शहरों के साथ हरियाणा के नगरों का नाश भी हो रहा है। बड़ी दरारें और रेगिस्तान का खिसकना पारिस्थितिकी तंत्र के सबसे बड़े संकट के प्रमाण हैं। अब किसी को यह संशय नहीं रहना चाहिए कि आमजन, प्रबुद्ध वर्ग और विशेषज्ञों का विरोध अनुचित नहीं है। वे जो आशंकाएं जता रहे थे, उनका सिलसिला तो पहले से शुरू हो चुका है और पारिस्थितिकी तंत्र का बड़ा नुकसान कर चुका है।
इतना बड़ा नुकसान कि इसकी भरपाई में सैकड़ों साल लग जाएंगे और शायद तब भी भरपाई संभव न हो। यह रिपोर्ट देश के प्रशासनिक अंगों की लालफीताशाही का बड़ा सबूत और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को ही कठघरे में रखने वाली है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने जो रिपोर्ट प्रस्तुत की है, वह 1972-75, 1982-84, 1994-96 और 2005-07 के दौरान क्रमिक उपग्रह आधारित अध्ययनों के आधार पर बनी है। इसी मंत्रालय ने कुछ समय पूर्व सुप्रीम कोर्ट में जो रिपोर्ट पेश की थी, उसमें इस संकट, खतरे और नुकसान का हवाला नहीं था। उसने तो 100 मीटर से ऊंची पहाडिय़ों को ही अरावली पर्वतमाला का हिस्सा मानने की परिभाषा देकर डेढ़ लाख पहाडिय़ों को नष्ट करने की तैयारी कर ली थी। 2005-07 का उपग्रह आधारित अध्ययन तो तब भी उसके पास था। उसने तब इसके निष्कर्षों की गहराई में जाने की कोशिश नहीं की थी या अब उसे सुध आई है, दोनों स्थिति में मंत्रालय को घोर लापरवाही और जीवन तंत्र के खिलाफ अक्षम्य अपराध करने का दोषी ही कहा जाएगा। यह तंत्र की बहुत बड़ी कमी है कि जीवन से इतने गहरे जुड़े गंभीर मुद्दों पर इस तरह सतही रुख अपना लिया जाता है। इस मामले में जन मानस उद्वेलित हुआ तब फैसले पर पुनर्विचार हुआ।
अंदाजा लगाया जा सकता है कि जन मानस विद्रोह नहीं करता तो कितना अनर्थ हो जाता। इस विद्रोह की आवाज पहुंचने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रालय की रिपोर्ट को प्रारंभिक स्तर पर अक्षरश: स्वीकार करने के अपने ही फैसले पर पुनर्विचार का निर्णय किया। ताजा रिपोर्ट के बाद हर वर्ग को यह आस बंधी है कि अब अरावली के पूर्व फैसले पर रोक नहीं, फैसला ही रद्द होने का आदेश आएगा। अच्छा हो कि तंत्र ही अरावली के संरक्षण के लिए अपने स्तर पर आगे आए और यह समझे कि आधी अधूरी रिपोर्टें सतही तौर पर बिना संवेदना के पेश करने से उसकी साख गिरती है।
Published on:
21 Jan 2026 01:11 pm
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