
देश की आधी आबादी को राजनीतिक हक देने की कवायद
राजेंद्र राठौड़
नेता प्रतिपक्ष, राजस्थान विधानसभा
महिला आरक्षण सम्बंधी विधेयक कैबिनेट के फैसले के बाद लोकसभा में पेश कर दिया गया है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 में देश की आधी आबादी को लोकसभा और विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण देने की अनुशंसा की गई है। यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिस देश में महिलाओं के वैदुष्य और उनके सामाजिक अवदान एवं समर्पण की ऐसी गौरवशाली परंपरा रही हो, वहां उन्हें सत्ता में एक तिहाई सहभागिता के लिए इतने लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा। मोदी सरकार का यह ऐतिहासिक निर्णय इस देश के राजनीतिक भविष्य को गुणात्मक रूप से प्रभावित करेगा और देश की चहुंमुखी प्रगति के द्वार खोलेगा।
ऐतिहासिक रूप से राजनीति में महिलाओं के लिए आरक्षण का मुद्दा भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के समय सामने आया। वर्ष 1931 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में बेगम शाह नवाज और सरोजिनी नायडू द्वारा नए संविधान में महिलाओं की स्थिति पर गौर फरमाने का आग्रह किया गया था। आजादी के बाद महिलाओं के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (1988) में सिफारिश की गई थी कि महिलाओं को पंचायत से लेकर संसद के स्तर तक आरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। इन सिफारिशों ने संविधान के 73वें और 74वें संशोधन का मार्ग प्रशस्त किया। इसके तहत पंचायती राज संस्थानों के हर स्तर पर तथा शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया। नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 में महिलाओं के लिए लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव है। आरक्षित सीटों को राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में क्रमिक रूप से आवंटित किया जा सकता है। सरकार द्वारा लोकसभा में पेश 128वां सविधान संशोधन विधेयक 2023 के माधयम से अनुच्छेद 239 एए एवं 334 ए जोड़ा जाएगा तथा 330 ए और 332 को संशोधित किया जा रहा है। ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2023 के अनुसार, यद्यपि पिछले साल की तुलना में भारत की रैंकिंग में 8 स्तर का सुधार हुआ हैै और अब हम 146 देशों की सूची में 127वें नंबर पर आ गए हैं। अभी संसद में कुल सांसदों की तुलना में महिला सांसद प्रतिनिधित्व करीब 15 प्रतिशत है जो 2006 में प्रारम्भिक रिपोर्ट के बाद से सबसे अधिक है। यह सच है कि पितृसत्तात्मक मानदंडों और परम्परागत मानसिकता के चलते ऐतिहासिक रूप से भारत में महिलाओं को हाशिए पर रखा गया। महिलाओं ने सामाजिक सुधारों तथा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में प्रभावशाली योगदान दिया, जो बंगाल में स्वदेशी आंदोलन (1905-08) के साथ शुरू हुआ था, जिसमें महिलाओं ने राजनीतिक आंदोलनों में नेतृत्व की स्थिति को संभाला। आजादी के बाद भारत के संविधान ने यह व्यवस्था दी कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में पुरुषों एवं महिलाओं के साथ समान व्यवहार किया जाएगा, लेकिन भारत में अधिकांश राज्य विधानसभाओं में महिला सदस्यों के प्रतिनिधित्व का परिदृश्य आज भी निराशाजनक है।
एक ओर जहां आजादी के पिछले 75 वर्षों में लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10 प्रतिशत भी नहीं बढ़ा है, वहीं दूसरी ओर वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में पुरुषों की तुलना में लगभग उतनी ही महिलाओं ने मतदान किया। यह भारतीय राजनीति में लैंगिक समानता की यात्रा में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव है। भारतीय राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनेक वर्षों से चर्चा का विषय रहा है। भारतीय राजनीति में महिलाओं के बेहतर प्रतिनिधित्व के लिए सीटों के आरक्षण के अलावा कुछ और तरीके भी हो सकते हैं। जैसे सामाजिक जागरूकता, शिक्षा, ***** आधारित हिंसा और उत्पीडऩ को रोकने के लिए आवश्यक कदम, चुनावी प्रक्रिया में सुधार इत्यादि। महिलाओं का राजनीतिक सशक्तीकरण चार मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित है - महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता, महिलाओं को उनकी क्षमता के पूर्ण विकास का अधिकार, महिलाओं के प्रतिनिधित्व और आत्मनिर्णय का अधिकार एवं राजनीतिक प्रक्रिया में किशोरवय लड़कियों की सक्रिय भागीदारी। देशभर में पंचायती राज संस्थाओं ने महिला प्रतिनिधियों को जमीनी स्तर पर व्यवस्था में शामिल करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पार्टी स्तर पर मौलिक सुधार भी उचित महिला प्रतिनिधित्व के लिए मददगार बन सकते हैं। महिला आरक्षण कानून के साथ-साथ राजनीति में महिलाओं की अधिक भागीदारी के लिए राजनीतिक दलों को अपने आंतरिक ढांचे को उनके और अधिक अनुकूल बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।
Published on:
20 Sept 2023 09:23 pm
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