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‘पहले बेघर को घर’ की नीति से मिल सकती है हर एक को छत

संयुक्त राष्ट्र ने 1985 में हर साल अक्टूबर माह के पहले सोमवार को विश्व पर्यावास दिवस (वल्र्ड हैबिटेट डे) घोषित किया ताकि हमारे कस्बों व शहरों की स्थिति और सभी को पर्याप्त आवास के मौलिक अधिकार को प्रतिबिंबित किया जा सके। सबसे पहले 1986 में नैरोबी, केन्या में ‘विश्व पर्यावास दिवस’ मनाया गया, जिसकी थीम थी द्ग ‘आश्रय मेरा अधिकार है।’ आज, विश्व की आधे से ज्यादा आबादी शहरों में रहती है और यह संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। शहर आर्थिक वृद्धि और विकास के केंद्र होते हैं पर उनके समक्ष जनसांख्यिकीय, पर्यावरणीय, आर्थिक एवं सामाजिक चुनौतियां पेश आती हैं।वर्ष 2022 में विश्व पर्यावास दिवस की थीम है - ‘खयाल रहे कि असमानता न रहे। कोई भी व्यक्ति और स्थान पीछे न छूटे।’

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जयपुर

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Patrika Desk

Oct 02, 2022

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संयुक्त राष्ट्र ने 1985 में हर साल अक्टूबर माह के पहले सोमवार को विश्व पर्यावास दिवस (वल्र्ड हैबिटेट डे) घोषित किया ताकि हमारे कस्बों व शहरों की स्थिति और सभी को पर्याप्त आवास के मौलिक अधिकार को प्रतिबिंबित किया जा सके। सबसे पहले 1986 में नैरोबी, केन्या में ‘विश्व पर्यावास दिवस’ मनाया गया, जिसकी थीम थी द्ग ‘आश्रय मेरा अधिकार है।’ आज, विश्व की आधे से ज्यादा आबादी शहरों में रहती है और यह संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। शहर आर्थिक वृद्धि और विकास के केंद्र होते हैं पर उनके समक्ष जनसांख्यिकीय, पर्यावरणीय, आर्थिक एवं सामाजिक चुनौतियां पेश आती हैं।
वर्ष 2022 में विश्व पर्यावास दिवस की थीम है - ‘खयाल रहे कि असमानता न रहे। कोई भी व्यक्ति और स्थान पीछे न छूटे।’ इसमें बढ़ती असमानता और कमजोरियों पर फोकस किया गया है, जिनके कारण हैं तीन ‘सी’ द्ग कोविड-19, क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) और शहरों में कॉन्फ्लिक्ट (संघर्ष)। इन तीनों संकटों ने गरीबों का एक नया वर्ग तैयार कर दिया है। इस नए वर्ग में वे लोग शामिल हैं जो महामारी न आई होती तो गरीबी से उबर सकते थे लेकिन उबर नहीं पाए और गरीब ही रहे, और वे भी जो महामारी के कारण गरीब हो गए। यूएन हैबिटेट्स की वल्र्ड सिटीज रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में ऐसे प्रभावित लोगों की संख्या 11.9 करोड़ और 12.4 करोड़ के बीच थी, जबकि 2021 में 14.3 करोड़ और 16.3 करोड़ के बीच रही।