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मेघ ही नहीं, राग मेघ मल्हार भी उत्साह और उम्मीद का प्रतीक

मेघ मल्हार वर्षा की अनुभूति कराने वाला अनोखा राग है, फिल्मों में बारिश के आह्वान के लिए या फिर बारिश के दृश्यों को पूर्णता के लिए या फिर बारिश के भाव के लिए मेघ मल्हार के प्रयोग होते रहे हैं। यह उम्मीद और आस का राग है।

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विनोद अनुपम

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक

कैसा महसूस होगा, जब बारिश में भीगते हुए किसी शहर की किसी सड़क से गुजरते हुए संतूर पर बज रहा राग मेघ मल्हार सुनाई देे। हमारे लिए यह कल्पना होगी। आंध्र प्रदेश के शहर विजयवाडा के लिए यह सच है, जहां एक खास ब्रांड की चाय के प्रचार के लिए एक ऐसी होर्डिंग लगाई गई है, जिसकी बनावट कुछ ऐसी है कि बारिश की बूंदें लकड़ी से बने हत्थे के एक सिरे पर बने कप में जमा होती हैं और असंतुलित होकर खाली होने और होर्डिंग पर लगे तारों से टकराने पर मेघ मल्हार की ध्वनि गूंजने लगती है। वास्तव में तकनीक, प्रकृति और संगीत का एक अद्भुत समन्वय है यह, जिसे प्रख्यात शास्त्रीय संगीतज्ञ तौफीक कुरेशी और संतूर वादक शांतनु गोखले के निर्देशन में तैयार करवाया गया।

यह जानना भी दिलचस्प है कि अपने फ्यूजन के लिए चर्चित तौफीक कुरेशी उस्ताद अल्लारखा खां के बेटे और उस्ताद जाकिर हुसैन के भाई हैं, लेकिन संगीत की शिक्षा इन्होंने घाटम के गुरु पं. विक्कू विनायक राम से प्राप्त की। निश्चय ही उनके इस अभिनव प्रयोग में घाटम के ज्ञान का अहम योगदान रहा होगा। 2,250 वर्गफीट के इस विशाल होर्डिंग में 31 लकडी के हत्थे हैं, जिनके एक सिरे पर वर्षा की बूंदें सहेजने के लिए कप बने हैं और इतनी ही संख्या में स्ट्रिंग्स हैं। आश्चर्य नहीं कि दुनिया के सबसे बडे पर्यावरण अनुकूल होर्डिंग के रूप में इसे गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रेकॉर्ड में भी शामिल किया गया है। वास्तव में चाय बेचने वाली कंपनी को पता है कि वर्षा से चाय का संबंध भले ही नया हो, मेघ मल्हार का संबंध बहुत पुराना है। होती होगी मेघ मल्हार के गायन पर बारिश, आज भी कहीं भी, मेघ मल्हार सुनें तो बारिश का अहसास तो होने ही लगता है। कहते हैं तानसेन ने जब अकबर के अनुरोध पर राग दीपक गाया और फिर अपने ही ताप से उसका बदन जलने लगा तो उसकी ही शिष्या ने मेघ मल्हार गाकर बारिश को आमंत्रित किया और उसका ताप शांत हुआ। सिनेमा में राग मेघ मल्हार पर आधारित पहला गीत भी 1942 में बने 'तानसेन' का ही माना जाता है। जिसे खेमचंद प्रकाश के संगीत निर्देशन में खुर्शीद ने गाया था, बरसो रे कारे बदरवा हिया में बरसो…।

मेघ मल्हार वर्षा की अनुभूति कराने वाला अनोखा राग है, फिल्मों में बारिश के आह्वान के लिए या फिर बारिश के दृश्यों को पूर्णता के लिए या फिर बारिश के भाव के लिए मेघ मल्हार के प्रयोग होते रहे हैं। यह उम्मीद और आस का राग है। 'साहब बीबी और गुलाम' में छोटी बहू पति के इंतजार में बेचैन शृंगार कर रही है, मिलन की उम्मीद अभिव्यक्त होती है राग मेघ में … 'पिया ऐसे जिया में समाय गयो रे कि मैं तन मन की सुध गंवा बैठी..।' मेघ और मेघ मल्हार दोनों ही जीवन के प्रतीक हैं। ये जिस भी रूप में हमारे जीवन में दस्तक देते हैं, स्वीकार्य है, होर्डिंग पर ही सही।